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________________ 364] सर्वार्थसिद्धौ [9147891 - प्रक्षीणघाटि... केलिनो द्विविधाः स्नातकाः । त एते पंचापि निम्रन्याः । चारित्रपरिणामस्य प्रकर्षाप्रकर्षभेदे सत्यपि नैगमसंग्रहादिनयापेक्षया सर्वेऽपि ते निम्रन्था इत्युच्यन्ते । 8911. तेषां पुलाकादीनां भूयोऽपि विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह संयमश्रुतप्रतिसेवनातीलिंगलेश्योपपादस्थानविकल्पतः साध्याः ॥47॥ 6 912. त एते पुलाकादयः संयमादिभिरष्टभिरनुयोगः साध्या व्याख्येयाः। तद्यथापुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीला द्वयोः संयमयोः सामायिकच्छेदोपस्थापनयोर्वर्तन्ते । कषायकुशोला द्वयोः संयमयोः परिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययोः पूर्वयोश्च । निर्ग्रन्थस्नातका एकस्मिन्नेव पयाख्यातसंयमे सन्ति। $913. श्रुतं-पुलाकबकुशप्रतिसेवनाकुशीला उत्कर्षेणाभिन्नाक्षरदशपूर्वधराः। कषायकुशीला निम्रन्याश्चतुर्दशपूर्वधराः । जघन्येन पुलाकस्य श्रुतमाचारवस्तु । बकुशकुशीलनिर्ग्रन्थानां श्रुतमष्टौ प्रवचनमातरः । स्नातका अपगतश्रुताः केवलिनः। ... $914. प्रतिसेवना-पञ्चानां मूलगुणानां रात्रिभोजनवर्जनस्य च पराभियोगाद् बलादन्यतमं प्रतिसेवमानः पुलाको भवति । बकुशो द्विविधः--उपकरणबकुशः शरीरबकुशश्चेति । तत्रोपकरणबकुशो बहुविशेषयुक्तोपकरणाकांक्षी । शरीरसंस्कारसेवी शरीरबकुशः । प्रतिसेवनारेखा अप्रकट रहती है उसी प्रकार जिनके कर्मोंका उदय अप्रकट हो और जो अन्तर्मुहर्तके बाद प्रकट होनेवाले केवलज्ञान और केवलदर्शनको प्राप्त करते हैं दे निग्रन्थ कहलाते हैं। जिन्होंने चार घातिया कर्मोका नाश कर दिया है ऐसे दोनों प्रकारके केवली स्नातक कहलाते हैं। ये पाँचों ही निर्ग्रन्थ होते हैं । इनमें चारित्ररूप परिणामोंकी न्यूनाधिकताके कारण भेद होनेपर भी नैगम और संग्रह आदि नयोंकी अपेक्षा वे सब निर्ग्रन्थ कहलाते हैं। 8911. अब उन पुलाक आदिके सम्बन्धमें पुनरपि ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थानके भेदसे इन निर्गन्धोंका व्याख्यान करना चाहिए ॥47॥ 89 2. ये पुलाक आदि संयम आदि आठ अनुयोगोंके द्वारा साध्य हैं अर्थात् व्याख्यान करने योग्य हैं । यथा--पुलाक, बकुश और प्रतिसेवनाकुशील सामायिक और छेदोपस्थापना इन दो संयमोंमें रहते हैं । कषायकुशील पूर्वोक्त दो संयमोंके साथ परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय इन दो संयमोंमें रहते हैं । निर्ग्रन्थ और स्नातक एक मात्र यथाख्यात संयममें रहते हैं। 913. श्रुत--पुलाक, बकुश और प्रतिसेवनाकुशील उत्कृष्टरूपसे अभिन्नाक्षर दश पूर्वधर होते हैं । कषायकुशील और निर्ग्रन्थ चौदह पूर्वधर होते हैं । जघन्यरूपसे पुलाकका श्रुत आचार वस्तुप्रमाण होता है । बकुश, कुशोल और निर्ग्रन्थोंका श्रुत आठ प्रवचनमातृकाप्रमाण होता है । स्नातक श्रुतज्ञानसे रहित केवली होते हैं। 8914. प्रतिसेवना-दूसरोंके दबाववश जबरदस्तीसे पाँच मूलगुण और रात्रिभोजन वर्जन व्रतमेंसे किसी एकको प्रतिसेवना करनेवाला पुलाक होता है । बकुश दो प्रकारके होते हैं, उपकरणबकुश और शरीरबकुश। उनमेंसे अनेक प्रकारकी विशेषताओंको लिये हुए उपकरणोंको चाहनेवाला उपकरणबकुश होता है तथा शरीरका संस्कार करनेवाला शरीरबकुश होता है। प्रतिसेवना कुशील मूलगुणोंको विराधना न करता हुआ उत्तरगुणोंकी किसी प्रकारको विराधना Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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