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________________ -9146 8 910] नवमोऽध्यायः [363 5909. आह, सम्यग्दर्शनसंनिधानेऽपि यद्यसंस्थेयगुणनिर्जरत्वात्परस्परतो न साम्यमेषां कि सहि बायकववमी विरतादयो गुणभेदान्न निर्ग्रन्थतामहन्तीति ? उच्यते, नैतदेवम् । कुतः । यस्माद् गुणमेवादन्योऽन्यविशेषेऽपि नेगमादिनयव्यापारात्सर्वेऽपि हि भवन्ति---- पुलाकबकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः ॥46॥ 8910. उत्तरगुणभाव'नापेतमनसो व्रतेष्वपि क्वचित्कदाचित्परिपूर्णतामपरिप्राप्नुवन्तोऽ. विधुसपुलाकसादृश्यात्पुलाका इत्युच्यन्ते । नम्रन्थ्यं प्रति स्थिता अखण्डितव्रताः शरीरोपकरणविभूपानुवर्तिनोऽविविक्तपरिवारा मोहशबलयुक्ता बकुशाः । शबलपर्यायवाची बकुशशब्दः । कुशीला द्विविधाः--प्रतिसेवनाकुशीलाः कषायकुशीला इति । अविविक्तपरिग्रहाः परिपूर्णोभयाः कथंचिदुत्तरगुण विराधिनः प्रतिसेवनाकुशोलाः । वशीकृतान्यकषायोदयाः संज्वलनमात्रतन्त्राः कषायकुशीलाः। उदकदमराजिवदनभिव्यक्तोदयकर्माणः ऊध्वं मुहूर्तादुद्भिद्यमानकेवलज्ञानदर्शनभाजो निर्ग्रन्थाः। विशेषा--यहाँ मुख्य रूपसे गुणश्रेणि निर्जराके दस स्थानोंका निर्देश किया गया है। वहंख्यात गुणितक्रम श्रेणिरूपसे कर्मोंकी निर्जरा होना गुणश्रेणिनिर्जरा है । यह गुणश्रेणि निर्जरा सर्वदा नहीं होती किन्तु उपशमना और क्षपणाके कारणभूत परिणामोंके द्वारा ही गुणश्रेणि रचना होकर यह निर्बरा होती है । गुणश्रेणि रचना दो प्रकारको होती है-एक तो गलितावशेष गुणश्रेणि रचना और दूसरी अवस्थित गुणश्रेणि रचना । यह कहाँ किस प्रकारकी होती है इसे लब्धिसार क्षपणासारसे जान लेना चाहिए । यहाँ इतना ही विशेष वक्तव्य है कि यहाँ जो दस स्थान बतलाये हैं उनमें उत्तरोत्तर गुणश्रेणिनिर्जराके लिए असंख्यातगुणा द्रव्य प्राप्त होता है किन्तु भागे-आगे गुणश्रेणिका काल संख्यातगुणा हीन-हीन है । अर्थात् सम्यग्दृष्टिको गुणश्रेणि निर्जरामें को बन्तर्महुर्त काल लगता है उससे श्रावकको संख्यात गुणा हीन काल लगता है पर सम्यग्दृष्टि गणवेणि द्वारा बितने कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा करता है उससे श्रावक असंख्यात गणे कर्मपरमाणओंकी निर्जरा करता है। इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिए। 8909. कहते हैं, सम्यग्दर्शनका सान्निध्य होनेपर भी यदि असंख्येयगुण निर्जराके कारण ये परस्परमें समान नहीं हैं तो क्या श्रावकके समान ये विरत आदिक भी केवल गुणभेदके कारण निर्ग्रन्थपनेको नहीं प्राप्त हो सकते हैं, इसलिए कहते हैं कि यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि यतः गुणभेदके कारण परस्पर भेद होनेपर भी नैगमादि नयको अपेक्षा वे सभी होते हैं पुसाक, बकुश, कुशील, निर्गन्य और स्नातक ये पांच निर्ग्रन्थ हैं ॥460 8910. जिनका मन उत्तरगुणोंकी भावनासे रहित है, जो कहीं पर और कदाचित् व्रतोंमें भी परिपूर्णताको नहीं प्राप्त होते हैं वे अविशुद्धपुलाक (मुरझाये हुए धान्य) के समान होनेसे पुलाक कहे जाते हैं । जो निर्ग्रन्थ होते हैं, व्रतोंका अखण्डरूपसे पालन करते हैं, शरीर और उपकरणोंकी शोभा बढ़ाने में लगे रहते हैं, परिवारसे घिरे रहते हैं और विविध प्रकारके मोहसे युक्त होते हैं वे बकुश कहलाते हैं । यहां पर बकुश शब्द 'शबल' (चित्र-विचित्र) शब्दका पर्यायवाची है। कुशील दो प्रकारके होते हैं---प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशील । जो परिग्रहसे घि है, जो मूल और उत्तरगुणोंमें परिपूर्ण हैं लेकिन कभी-कभी उत्तरगुणोंको विराधना करते हैं वे प्रतिसेवनाकुशील कहलाते हैं । जिन्होंने अन्य कषायोंके उदयको जीत लिया है और जो केवल संज्वलन कषायके अधीन हैं वे कषायकुशील कहलाते हैं। जिस प्रकार जलमें लकड़ीसे की गयी 1.-भावनोपेत-- मु.। 2. शुद्धा: पुलाक- मु.। 3. - वारा मोहछेदशवल- आ., दि. 1 ।--वारान मोहसवम-दि. 21 4. -विरोधिन: मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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