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________________ सर्वार्थसिद्धौ [9145 § 908पानपङ्क्त्योत्प्लवमानो बहुतरकर्मनिर्जरो भवति । स एव पुनः प्रथमसम्यक्त्व प्राप्तिनिमित्तसंनिधाने सति सम्यग्दृष्टिर्भवन्नसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहकर्म विकल्पाप्रत्याख्यानावरणक्षयोपशमनिमित्तपरिणामप्राप्तिकाले विशुद्धिप्रकर्षयोगात् श्रावको भवन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनः प्रत्याख्यानावरणक्षयोपशमकारणपरिणामविशुद्धियोगाव् विरलव्यपदेशभाक् सन् ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनरनन्तानुबन्धिक्रोधमान माया लोभानां वियोजनपरो भवति यदा तदा परिणामविशुद्धिप्रकर्ष योगात्ततोऽसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनर्दर्शनमोहप्रकृतित्रयतृणनिचयं निर्दिधक्षन् परिणामविशुद्धयतिशययोगाद्दर्शनमोहक्षपकव्यपदेशभाक् पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । एवं सः क्षायिकसम्यग्दृष्टिभूत्वा श्रेष्यारोहणाभिमुखचारित्रमोहोपशमं प्रति व्याप्रियमाणो विशुद्धिप्रकर्षयो गादुपशमकव्यपदेशमनुभवन् पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनरशेषचारित्र मोहोपशमनिमित्तसंनिधाने परिप्राप्तोपशान्तकषायव्यपदेशः पूर्वोक्ताद संख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव पुनश्चारित्रमोहक्षपणं प्रत्यभिमुखः परिणामविशुद्धया वर्द्धमानः क्षपकव्यपदेशमनुभवन्पूर्वोक्ताद संख्येयगुण निर्जरो भवति । स यदा निःशेषचारित्रमोहक्षपणकारणपरिणामः भिमुखः क्षीणकषायव्यपदेशमास्कन्दन्पूर्वोक्तादसंख्येयगुणनिर्जरो भवति । स एव द्वितीयशुक्लध्यानानल निर्दग्धघातिकर्मनिचयः सन् जिनव्यपदेशभाक् पूर्वोक्ताद संख्येयगुणनिर्जरो भवति । 362 हो रहा है ऐसा भव्य पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक जीव क्रमसे अपूर्वकरण आदि सोपान पंक्तिपर चढ़ता हुआ बहुतर कर्मोकी निर्जरा करनेवाला होता है । सर्वप्रथम वह ही प्रथम सम्यक्त्वकी प्राप्ति के निमित्तके मिलनेपर सम्यग्दृष्टि होता हुआ असंख्येयगुण कर्मनिर्जरावाला होता है । पुनः वह हो चारित्र मोहनीय कर्मके एक भेद अप्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परि णामोंकी प्राप्ति के समय विशुद्धिका प्रकर्ष होनेसे श्रावक होता हुआ उससे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है । पुनः वह हो प्रत्याख्यानावरण कर्मके क्षयोपशम निमित्तक परिणामों की विशुद्धिवश विरत संज्ञाको प्राप्त होता हुआ उससे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है । पुनः वह ही जब अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभकी विसंयोजना करता है तब परिणामोंकी विशुद्धिके प्रकर्षवश उससे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है । पुनः वह ही दर्शनमोहनीयत्रिकरूपी तृणसमूहको भस्मसात् करता हुआ परिणामोंकी विशुद्धिके अतिशयवश दर्शनमोह क्षपक संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहले से असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है। इस प्रकार वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर श्रेणिपर आरोहण करनेके सम्मुख होता हुआ तथा चारित्र मोहनीयके उपशम करनेके लिए प्रयत्न करता हुआ विशुद्धिके प्रकर्षवश उपशमक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है । पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयके उपशमक निमित्त मिलनेपर उपशान्तकषाय संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है । पुनः वह ही चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके लिए सम्मुख होता हुआ तथा परिणामोंकी विशुद्धिसे वृद्धिको प्राप्त होकर क्षपक संज्ञाको अनुभव करता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है । पुनः वह ही समस्त चारित्रमोहनीयकी क्षपणा के कारणोंसे प्राप्त हुए परिणामोंके अभिमुख होकर क्षीणकषाय संज्ञाको प्राप्त करता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येय गुण निर्जरावाला होता है । पुनः वह ही द्वितीय शुक्लध्यान रूपी अग्निके द्वारा घातिकर्म समूहका नाश करके जिन संज्ञाको प्राप्त होता हुआ पहले कही गयी निर्जरासे असंख्येयगुण निर्जरावाला होता है । 1. भाक् तेष्वेव पूर्वो-- मु. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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