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________________ --9145 8 908] नवमोऽध्यायः 1361 शेषकर्मरेणुपरिशातनशक्तिस्वाभाव्याद्दण्डकपाटप्रतरलोकपूरणानि स्वात्मप्रदेशविसर्पणतश्चतुभिः समयैः कृत्वा पुनरपि तावद्भिरेव समयैः समुपहृतप्रदेशविसरणः समीकृतस्थितिशेषकर्मचतुष्टयः पूर्वशरीरप्रमाणो भूत्वा सूक्ष्मकाययोगेन सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति ध्यानं ध्यायति । ततस्तदनन्तरं समुच्छिन्नक्रियानिवतिध्यानमारभते। समुच्छिन्नप्राणानप्रचारसर्वकायवाङ्मनोयोगसर्वप्रदेशपरिस्पन्दक्रियाव्यापारत्वात् समुच्छिन्नत्रियानिवर्तीत्युच्यते। तस्मिन्समुच्छिन्नक्रियानितिनि ध्याने सर्वबन्धास्रवनिरोधसर्वशेषकर्मशातनसामोपपत्तेरयोगिकेवलिनः संपूर्णयथाख्यातचारित्रज्ञानदर्शनं सर्वसंसारदुःखजालपरिष्वङ्गोच्छेदजननं साक्षान्मोक्षकारणमुपजायते । स पुनरयोगकेवली भगवांस्तदा ध्यानातिशयाग्निनिर्दग्धसर्वमलकलंकबन्धनो निरस्तकिटधातपाषाणजात्यकनकबल्लब्धात्मा परिनिर्वाति । तदेतद् द्विविधं तपोऽभिनवकर्मास्रवनिरोधहेतुत्वात्संवरकारणं प्राक्तनकर्मरजोविधूनननिमित्तत्वान्निर्जराहेतुरपि भवति । $ 907. अत्राह सम्यग्दृष्टयः कि सर्वे समनिर्जरा आहोस्वित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते-- ____ सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्त ___ मोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥45॥ 8908. त एते दश सम्यग्दृष्टयादयः क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः । तद्यथा भव्यः पचेन्द्रियसंज्ञी पर्याप्तकः पूर्वोक्तकाललब्ध्यादिसहायः परिणामविशुद्धया वर्धमानः क्रमेणापूर्वकरणादिसोऔर जिनके स्वल्पमात्रामें कर्मोका परिपाचन हो रहा है ऐसे वे अपने आत्मप्रदेशोंके फैलनेसे कर्मरजको परिशातन करनेको शक्तिवाले दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घातको चार समयोंके द्वारा करके अनन्तर प्रदेशों के विसर्पणका संकोच करके तथा शेष चार कर्मोकी स्थितिको समान करके अपने पूर्व शरीरप्रमाण होकर सूक्ष्म काययोगके द्वारा सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानको स्वीकार करते हैं। इसके बाद चौथे समुच्छिन्न क्रियानिवति ध्यानको आरम्भ करते हैं। इसमें प्राणापानके प्रचाररूप क्रियाका तथा सब प्रकारके काययोग, वचनयोग और मनोयोगके द्वारा होनेवालो आत्मप्रदेश परिस्पन्दरूप क्रियाका उच्छेद हो जानेसे इसे समुच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यान कहते हैं। इस समुच्छिन्नक्रियानिवति ध्यानमें सब प्रकारके कर्मबन्धके आस्रवका निरोध हो जानेसे तथा बाकीके बचे सब कर्मोके नाश करने की शक्तिके उत्पन्न हो जानेसे अयोगिकेवली के संसारके सब प्रकारके दुःखजालके सम्बन्धका उच्छेद करनेवाला सम्पूर्ण यथाख्यातचारित्र, ज्ञान और दर्शनरूप साक्षात् मोक्षका कारण उत्पन्न होता है। वे अयोगिकेवली भगवान् उस समय ध्यानातिशयरूप अग्निके द्वारा सब प्रकारके मल-कलंकबन्धनको जलाकर और किट्ट धातु व पाषाणका नाशकर शद्ध हए सोने के समान अपने आत्माको प्राप्तकर परिनिर्वाणको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यह दोनों प्रकारका तप नूतन कर्मोके आस्रवके निरोधका हेतु होनेसे संवरका कारण है और प्राक्तन कर्मरूपी रजके नाश करनेका हेतु होनेसे निर्जराका भी हेतु है। 8907. यहाँ कहते हैं कि सब सम्यग्दष्टि क्या समान निर्जरावाले होते हैं या कुछ विशेषता है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं--- ___सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्तानुबन्धिवियोजक, दर्शनमोहक्षपक, उपशमक, उपशान्तमोह, क्षपक, क्षीणमोह और जिन ये क्रमसे असंख्यगुण निर्जरावाले होते हैं ॥451 8908. सम्यग्दृष्टि आदि ये दश क्रमसे असंख्येयगुण निर्जरावाले होते हैं। यथा-जिसे पूर्वोक्त काललब्धि आदिकी सहायता मिली है और जो परिणामोंकी विशुद्धि द्वारा वृद्धिको प्राप्त For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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