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________________ 356] सर्वार्थसिद्धौ [91368 890 असाता, अरति, शोक और भय कर्मकी उदय-उदीरणा होने लगती है। यह कालनिमित्तक उदय णा है। इसी प्रकार क्षेत्र, भव और भावनिमित्तक उदय और उदीरणा जान लेनी चाहिए। कालप्राप्त कर्मपरमाणुओंके अनुभव करनेको उदय कहते हैं और उदयावलिके बाहर स्थित कर्मपरमाणुओंको कषायसहित या कषायरहित योग संज्ञावाले वीर्यविशेषके द्वारा उदयावलिमें लाकर उनका उदयप्राप्त कर्मपरमाणओं के साथ अनुभवन करनेको उदीरणा कहते हैं। इस प्रकार कर्मपरमाणुओंका अनुभवन उदय और उदीरणा दोनोंमें लिया जाता है। यदि इनमें अन्तर है तो कालप्राप्त और अकालप्राप्त परमाणुओंका है। उदयमें कालप्राप्त कर्मपरमाणु रहते हैं और उदीरणामें अकालप्राप्त कर्मपरमाण रहते हैं। सामान्य नियम यह है कि जहाँ जिस कर्मका उदय होता है वहाँ उसकी उदीरणा अवश्य होती है। फिर भी इनमें जो विशेषता है उसका यहाँ निर्देश करते हैं-मिथ्यात्वका उदय और उदीरणा मिथ्यात्व गुणस्थान में होती है। इतनी विशेषता है कि उपशम सम्यक्त्वके अभिमुख हुए जीवके अन्तिम आवली प्रमाण कालमें मिथ्यात्वकी उदीरणा नहीं होती, वहाँ मात्र उसका उदय होता है। एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, श्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रियजाति, आतप, स्थावर. सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण इन नो प्रकृतियोंकी मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं। अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी प्रारम्भके दो गुणस्थानोंमें हो उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । सम्यमिथ्यात्वकी तीसरे गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है, अन्यत्र नहीं । अप्रत्याख्यान चार, नरकगति, देवगति, वैक्रियिक शरीर,वैक्रियिक अंगोपांग, दुर्भग, अनादेय और अयशस्कीति इन ग्यारह प्रकतियोंका चौथे गणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होतो है आगे नहीं। नरकाय और देवायुकी चौथे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । मात्र मरणके समय अन्तिम आवलिकालमें उदीरणा नहीं होती। चार आनुपूर्वियोंकी प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है अन्यत्र नहीं। प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, तिर्यंचगति, उद्योत और नीचगोत्र इन सात प्रकृतियोंकी संयतासंयत गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । तिर्यंच आयुकी पाँचवें गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है । मात्र मरणके समय अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं । निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, सातावेदनीय और असातावेदनीय इन पाँच प्रकृतियोंकी छठे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं। मात्र निद्रानिद्रादि त्रिककी उदीरणा वही करता है जिसने इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण कर ली है । ऐसा जीव यदि उत्तर शरीरकी विक्रिया करता है या आहारकसमुद्घातको प्राप्त होता है तो इन्हें प्राप्त होनेके एक आवलि कालपूर्वसे लेकर मूल शरीरमें प्रवेश होने तक इन तीनकी उदीरणा नहीं होती। तथा देव, नारकी और भोगभूमियाँ जीव भी इन तीनकी उदीरणा नहीं करते । आहारक शरीर और आहारक अंगोपांगका प्रमत्तसंयतमें ही उदीरणा और उदय होता है, आगे पीछे नहीं। मनुष्यायुकी छठे गुणस्थान तक उदीरणा और चौदहवें गुणस्थान तक उदय होता है। मात्र मरणके समय अन्तिम आवलि काल शेष रहने पर उदीरणा नहीं होती। सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणा और उदय चौथेसे लेकर सातवें गुणस्थानतक वेदकसम्यग्दृष्टिके होती है। मात्र कृतकृत्यवेदकके कालमें व द्वितीयोपशम सम्यक्त्वके उत्पसिकालमें एक आवलि शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं। अन्तके तीन संहननोंकी उदारणा व उदय सातवें गुणस्थान तक हो होती है आग नहीं हास्यादि छहको उदीरणा और उदय आठवें गुणस्थान तक होतो है आगे नहीं। इतनी विशेषता है कि देवोंके उत्पत्ति समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त काल तक हास्य और रतिको नियमसे उदीरणा होती है, आगे भजनीय है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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