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________________ - 9138 5893] नवमोऽध्यायः [357 8891. त्रयाणां ध्यानानां निरूपणं कृतम् । इदानी शुक्लध्यानं निरूपयितव्यम् । तद्वक्ष्यमाणचतुर्विकल्पम् । तत्राद्ययोः स्वामिनिर्देशार्थमिदमुच्यते-- शुक्ले चाये पूर्वविदः ।।37।। 6892. वक्ष्यमाणेषु शुक्लध्यानविकल्पेषु आद्य शुक्लध्याने पूर्वविदो भवतः श्रुतकेवलिन इत्यर्थः । 'च'शब्देन धर्म्यमपि समुच्चीयते । तत्र 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिः” इति श्रेण्यारोहणात्प्राग्धयं, श्रेण्योः शुक्ले इति व्याख्यायते।। 6893. अवशिष्टे कस्य भवत इत्यत्रोच्यते-- __ परे केविलनः ॥38॥ तथा नारकियोंके उत्पत्तिसमयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कालतक अरति और शोकको नियमसे उदीरणा होती है, आगे भजनीय है । तीन वेद और क्रोधादि तोन संज्वलनोंकी उदीरणा व उदय नौवेंके उपान्त्य भाग तक ही होती है आगे नहीं । इतनी विशेषता है कि जो जिस वेदके उदयसे श्रेणि चढ़ता है उसके प्रथम स्थिति में एक आवलिकाल शेष रहनेपर उदोरणा नहीं होती। लोभसंज्वलनका दसवें गुणस्थान तक उदीरणा व उदय होता है । मात्र दसवें गुणस्थानके अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदोरणा नहीं होती, उदय होता है । वज्रनाराच और नाराच संहननका ग्यारहवें गुणस्थान तक उदीरणा और उदय होता है। निद्रा और प्रचलाकी बारहवें गुणस्थानमें एक समय अधिक एक आवलि काल शेष रहने तक उदय व उदीरणा दोनों होते हैं, आगे बारहवें गुणस्थानके उपान्त्य समय तक इनका उदय ही होता है । पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय इन चौदह प्रकृतियोंका उदय तो बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समय तक होता है और उदीरणा बारहवें गुणस्थानमें एक आवलि काल शेष रहने तक होती है। मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक, तैजस और कार्मण शरीर, छह संस्थान, औदारिक अंगोपांग, वज्रवृषभनाराच संहनन, वर्णादिक चार, अगुरुलघु, उपघात, उच्छवास, दोनों विहायोगति, बस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, दुःस्वर, आदेय, यशकीर्ति, निर्माण और उच्चगोत्र इन अड़तीस प्रकृतियोंकी तेरहवें गणस्थान तक उदीरणा व उदय होते हैं आगे नहीं। तथा तीर्थंकर प्रकृतिका तेरहवें गुणस्थान में ही उदीरणा व उदय होता है । इस प्रकार आज्ञा आदिके निमिनसे सतत चिन्तन करना धर्म्यध्यान है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। 8891. तीन ध्यानोंका कथन किया, इस समय शक्लध्यानका कथन करना चाहिए, उसके आगे चार भेद कहनेवाले हैं उनमें-से आदिके दो भेदोंके स्वामीका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्के होते हैं ॥37॥ ६ 892. आगे कहे जानेवाले शुक्लध्यानके भेदों में-से आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद अर्थात् श्रुतकेवलीके होते हैं। सूत्रमें 'च' शब्द आया है उससे धर्म्यध्यानका समुच्चय होता है। 'व्याख्यानते विशेष ज्ञान होता है' इस नियमके अनुसार श्रेणि चढ़नेसे पूर्व धर्माध्यान होता है और दोनों श्रेणियोंमें आदिके दो शुक्लध्यान होते हैं ऐसा व्याख्यान करना चाहिए। $ 893. शेषके दो शुक्लध्यान किसके होते हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं--- शेषके दो शुक्लध्यान केवलीके होते हैं ॥38॥ 1. 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणम् ।' परि शे., पृ. 8 । पा. म. भा., पृ. 57, 130, 154 । बक्खाणओ विसेसो न हि संदेहादलक्खणया ॥' -वि. भा., गा., 340 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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