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________________ 344) सर्वार्थसिद्धों [9118 § 855 'ययाख्यातम्' इति वा ययात्मस्वभावोऽवस्थितस्तथैवाख्यातत्वात् । 'इति' शब्दः परिसमाप्तौ द्रष्टव्यः । ततो यथाख्यातचारित्रात्सकलकर्मक्षयपरिसमाप्तिर्भवतीति ज्ञाप्यते । सामायिकादीनामानुपूर्व्यवचनमुत्तरोत्तरगुणप्रकर्ष ' ख्यापनार्थं क्रियते । 8855. आह, उक्तं चारित्रम् । तदनन्तरमुद्दिष्टं यत् 'तपसा निर्जरा च' इति तस्येदानीं इसलिए उसे अथाख्यात कहते हैं । 'अथ' शब्द 'अनन्तर' अर्थवर्ती होनेसे समस्त मोहनीय कर्मके क्षय या उपशमके अनन्तर वह आविर्भूत होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अथवा इस चारित्रका एक नाम यथाख्यात भी है । जिस प्रकार आत्माका स्वभाव अवस्थित है उसी प्रकार यह कहा गया है, इसलिए इसे यथाख्यात कहते हैं । सूत्रमें आया हुआ 'इति' शब्द परिसमाप्ति अर्थ में जानना चाहिए। इसलिए इससे यथाख्यात चारित्र से समस्त कर्मोके क्षयकी परिसमाप्ति होती है यह जाना जाता है । उत्तरोत्तर गुणोंके प्रकर्षका ख्यापन करनेके लिए सामायिक, छेदोस्थापना इत्यादि क्रमसे इनका नामनिर्देश किया है । विशेषार्थ-चारित्र यह एक प्रकारका होकर भी उसके पाँच भेद विवक्षाविशेषसे किये गये हैं । सामायिक में सर्वसावद्यकी निवृत्तिरूप परिणाम की मुख्यता है । छेदोपस्थापना में चारित्र लगनेवाले दोषोंके परिमार्जनकी मुख्यता है । परिहारविशुद्धि चारित्र ऐसे संयतके होता है ज तीस वर्षतक गृहस्थ अवस्था में सुखपूर्वक बिताकर संयत होनेपर तीर्थंकर पादमूलकी परिचर्या करते हुए आठ वर्ष तक प्रत्याख्यानपूर्व का अध्ययन करता है। यह जन्तुओंकी रक्षा कैसे करनी चाहिए, वे किस द्रव्यके निमित्तसे किस क्षेत्र और किस कालमें विशेषतः उत्पन्न होते हैं, जीवोंकी योनि और जन्म कितने प्रकार के होते हैं इत्यादि बातोंको भले प्रकार जानता है । यह प्रमादरहित, महाबलशाली, कर्मोकी महानिर्जरा करनेवाला और अति 'दुष्कर चर्याका अनुष्ठान करनेवाला होता है । तथा यह तीनों संध्याकालोंको छोड़कर दो कोस गमन करनेवाला होता है । इन सब कारणों से इस संयतके ऐसो सामर्थ्य उत्पन्न होती है जिसके बलसे यह अन्य जीवोंको बाधा पहुँचाये बिना चर्या करनेमें समर्थ होता है। सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात चारित्रका अर्थ स्पष्ट ही है । इस प्रकार विवक्षाभेदसे एक चारित्र पाँच प्रकारका कहा गया है । इनसे से सामायिक और छेदोपस्थापनाकी जघन्य विशुद्धिलब्धि सबसे अल्प होती है । इससे परिहारविशुद्धि चारित्रकी जघन्य विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे इसीकी उत्कृष्ट विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे सामायिक और छेदोपस्थापनाकी उत्कृष्ट विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे सूक्ष्मसाम्पराय चारित्रकी जघन्य विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती हैं । इससे इसकी उत्कृष्ट विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है । इससे यथाख्यात चारित्रकी विशुद्धिलब्धि एक प्रकारकी होकर भी अनन्तगुणी होती है। यही कारण है कि सूत्रमें सामायिक छेदोपस्थापना इत्यादि क्रमसे इन पाँचोंका नाम निर्देश किया है। पहले दस प्रकारके धर्मका निर्देश करते समय संयमधर्म कह आये हैं, इसलिए चारित्रका अन्तर्भाव उसमें हो जानेके कारण यहाँ इसका अलग से कथन करनेकी आवश्यकता नहीं होती है फिर भी समस्त कर्मका क्षय चारित्रसे होता है यह दिखलानेके लिए यहाँ चारित्रका पृथक्रूपसे व्याख्यान किया है । 8855. कहते हैं, चारित्रका कथन किया। संवरके हेतुओंका निर्देश करनेके बाद 'तपसा निर्जरा च' यह सूत्र कहा है, इसलिए यहाँ तपका विधान करना चाहिए, अतः यहाँ 1. - कर्षज्ञापनार्थम् मु. 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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