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________________ 9118 § 854] नवमोऽध्यायः [343 अवधिज्ञाना' द्यभावापेक्षया अज्ञानपरिषह इति नास्ति विरोधः । 8853. आह, उक्ता गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरिषहजयाः संवर हेतवः पञ्च । संव रहेतुचारित्रसंज्ञो वक्तव्य इति तद्भेदप्रदर्शनार्थमुच्यते- सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्म सांप राययथाख्यातमिति चारित्रम् ॥18॥ $ 854. अत्र चोद्यते - दशविधे धर्मे संयम उक्तः स एव चारित्रमिति पुनर्ग्रहणमनर्थकमिति ? नानर्थकम् ; धर्मेऽन्तर्भूतमपि चारित्रमन्ते गृह्यते मोक्षप्राप्तेः साक्षात्कारणमिति ज्ञापनार्थम् । सामायिकमुक्तम् । क्व ? 'दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक - ' इत्यत्र । तद् द्विविधं नियत कालमनियतकालं च । स्वाध्यायादि नियतकालम् । ईर्यापथाद्यनियतकालम् । प्रमादकृतानर्थ प्रबन्धविलोपे सम्यक्प्रतिक्रिया छेदोपस्थापना विकल्पनिवृत्तिर्वा । परिहरणं परिहारः प्राणिवधन्निवृत्तिः । तेन विशिष्टा शुद्धिर्य स्मिस्तत्परिहारविशुद्धिचारित्रम् । अतिसूक्ष्मकषायत्वात्सूक्ष्मसांपरायचारित्रम् । मोहनीयस्य निरवशेषस्योपशमात्क्षयाच्च आत्मस्वभावावस्थापेक्षालक्षणं अथाख्यात चारित्रमित्याख्यायते । पूर्वचारित्रानुष्ठायिभिराख्यातं न तत्प्राप्तं प्राङ्मोहक्षयोपशमाभ्यामित्यथाख्यातम् । अथशब्दस्यानन्त' र्यार्थ वृत्तित्वान्निरवशेषमोहक्षयोपशमानन्तरमाविर्भवतीत्यर्थः ' । ज्ञानकी अपेक्षा प्रज्ञा परीषह और अवधिज्ञान आदिके अभावकी अपेक्षा अज्ञान परीषह रह सकते हैं, इसलिए कोई विरोध नहीं है । 8853. कहते हैं, गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषहजय ये पाँच संवरके हेतु कहे । अब चारित्रसंज्ञक संवरका हेतु कहना चाहिए, इसलिए उसके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और ययाख्यात यह पाँच प्रकारका चारित्र है ॥18॥ 8854. शंका- दश प्रकारके धर्म में संयमका कथन कर आये हैं और वह ही चारित्र है, इसलिए उसका फिरसे ग्रहण करना निरर्थक है ? समाधान - निरर्थक नहीं है, क्योंकि धर्ममें अन्तर्भाव होनेपर भी चारित्र मोक्ष प्राप्तिका साक्षात् कारण है यह दिखलानेके लिए उसका अन्तमें ग्रहण किया है। सामायिकका कथन पहले कर आये हैं । शंका- कहाँ पर ? समाधान'दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक' - इस सूत्रका व्याख्यान करते समय । वह दो प्रकारका हैनियतकाल और अनियतकाल । स्वाध्याय आदि नियतकाल सामायिक है और ईर्यापथ आदि अनियतकाल सामायिक है । प्रमादकृत अनर्थप्रबन्धका अर्थात् हिंसादि अव्रतोंके अनुष्ठानका विलोप अर्थात् सर्वथा त्याग करनेपर जो भले प्रकार प्रतिक्रिया अर्थात् पुनः व्रतोंका ग्रहण होत है वह छेदोपस्थापना चारित्र है । अथवा विकल्पोंकी निवृत्तिका नाम छेदोपस्थापनाचारित्र है प्राणिवधसे निवृत्तिको परिहार कहते हैं। इससे युक्त शुद्धि जिस चारित्र में होती है वह परिहारविशुद्धि चारित्र है । जिस चारित्रमें कषाय अतिसूक्ष्म हो जाता है वह सूक्ष्मसाम्परायचारित्र है। समस्त मोहनीय कर्मके उपशम या क्षयसे जैसा आत्माका स्वभाव है उस अवस्थास्वरूप अपेक्षा लक्षण जो चारित्र होता है वह अथाख्यातचारित्र कहा जाता है। पूर्व चारित्रका अनुष्ठान करने वालोंने जिसका कथन किया है पर मोहनीय के क्षय या उपशम होनेके पहले जिसे प्राप्त नहीं किया, 1. -- ज्ञानापेक्षया मु. 1 2. कालंच । प्रमा-- ता. । 3. -- नन्तरार्थवर्ति-- मु., ता. । 4. त्यर्थः । तथा-- मु., ता., ना. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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