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________________ - 9198 834] नवमोऽध्यायः [335 5831. तुणग्रहणमुपलक्षणं कस्यचिद्व्यधनदुःखकारणस्य । तेन शुष्कतृणपरुषशर्कराकण्टकनिशितमृत्तिकाशूलादिव्य धनकृतपादवेदनाप्राप्तौ सत्यां तत्राप्रणिहितचेतसश्चर्याशय्यानिषद्यासु प्राणिपीडापरिहारे नित्यमप्रमत्तचेतसस्तृणादिस्पर्शबाधापरिषहविजयो वेदितव्यः । 6832. अप्कायिकजन्तुपीडापरिहारायामरणादस्नानव्रतधारिणः पीरविकिरणप्रतापजनितप्रस्वे वाक्तपवनानीतपांसुनिचयस्य सिध्मकच्छूददूदीर्णकण्डूयायामुत्पन्नायामपि कण्डूयनविमर्दनसंघट्टनविजितमूर्तेः स्वगतमलोपचय परगतमलापचययोरसंकल्पितमनसः 'सज्ज्ञानचारित्रविमलसलिलप्रक्षालनेन कर्ममलपंक निराकरणाय नित्यमुद्यतमतेर्मलपीडासहनमाख्यायते । 6833. सत्कारः पूजाप्रशंसात्मकः । पुरस्कारो नाम क्रियारम्भादिष्वग्रतः करणमामंत्रणं वा, तत्रानादरो' मयि क्रियते । चिरोषितब्रह्मचर्यस्य महातपस्विनः स्वपरसमयनिर्णज्ञस्य बहुकृत्वः परवादिविजयिनः प्रणामभक्तिसंभ्रमासनप्रदानादीनि मे न कश्चित्करोति । मिथ्यादृष्टय एवातीव भक्तिमन्तः किचिदजानन्तमपि सर्वज्ञसंभावनया संमान्य स्वसमयप्रभावनं कुर्वन्ति । व्यन्तरादयः पुरा अत्युग्रतपसां प्रत्यग्रपूजां निवर्तयन्तीति मिथ्या श्रुतिर्यदि न स्यादिदानी कस्मान्मादृशां न कुर्वन्तीति दुष्प्रणिधानविरहितचित्तस्य सत्कारपुरस्कारपरिषहविजय इति विज्ञायते। 6834. अङ्गापूर्वप्रकीर्णकविशारदस्य शब्दन्यायाध्यात्मनिपुणस्य मम पुरस्तावितरे 6831. जो कोई विंधनेरूप दुःखका कारण है उसका 'तृण' पदका ग्रहण उपलक्षण है। इसलिए सूखा तिनका, कठोर कंकड़, काँटा, तीक्ष्ण मिट्टी और शल आदिके विधनेसे पैरोंमें वेदनाके होनेपर उसमें जिसका चित्त उपयुक्त नहीं है तथा चर्या, शय्या और निषद्यामें प्राणिपीडाका परिहार करनेके लिए जिसका चित्त निरन्तर प्रमादरहित है उसके तृणस्पर्शादि बाधापरीषहजय जानना चाहिए। 8832. अप्कायिक जीवोंकी पीडाका परिहार करनेके लिए जिसने मरणपर्यन्त अस्नानव्रत स्वीकार किया है, तीक्ष्ण सूर्यको किरणोंके तापसे उत्पन्न हुए पसोनामें जिसके पवनके द्वारा लाया गया धूलिसंचय चिपक गया है, सिध्म, खाज और दादके होनेसे खुजलीके होनेपर भी जो खजलाने, मर्दन करने और दूसरे पदार्थसे घिसनेरूप क्रियासे रहित है, स्वगत मलका उपचय और सम्यक्चारित्ररूपी विमल जलके प्रक्षालन द्वारा जो कर्ममलपंकको दूर करनेके लिए निरन्तर उद्यतमति है उसके मलपीडासन कहा गया है। 8833. सत्कारका अर्थ पूजा-प्रशंसा है । तथा क्रिया-आरम्भ आदिकमें आगे करना या आमन्त्रण देना पुरस्कार है । इस विषयमें यह मेरा अनादर करता है। चिरकालसे मैंने ब्रह्मचर्यका पालन किया है, मैं महातपस्वी हूँ, स्वसमय और परसमयका निर्णयज्ञ हूँ, मैंने बहुत बार परवादियोंको जीता है तो भी कोई मुझे प्रणाम और भक्ति नहीं करता और उत्साहसे आसन नहीं देता, मिथ्यादृष्टि ही अत्यन्त भक्तिवाले होते हैं, कुछ नहीं जाननेवालेको भी सर्वज्ञ समझ कर आदर सत्कार करके अपने समयको प्रभावना करते हैं, व्यन्तरादिक पहले अत्यन्त उग्र तप करने वालोंकी प्रत्यग्र पूजा रचते थे यह यदि मिथ्या श्रुति नहीं है तो इस समय वे हमारे समान तपस्वियोंकी क्यों नहीं करते हैं इस प्रकार खोटे अभिप्रायसे जिसका चित्त रहित है उसके सत्कारपुरस्कारपरीषहजय जानना चाहिए। 8834, मैं अंग, पूर्व और प्रकीर्णक शास्त्रोंमें विशारद हूँ तथा शब्दशास्त्र, न्यायशास्त्र 1. -व्यथन-- मु.। 2. --स्वेदात्तपव- मु.। 3. -लोपचयगत-- मु.। 4. संज्ञान- मु.। 5. पंकजालनिरा- मु.। 6. -स्यायते । केशलुञ्चसंस्काराभ्यामुत्पन्नखेदसहन मलसामान्यसहनेऽन्तर्भवतीति न पृथगुक्तम् । सत्कार:- मु.। 7.-दरोऽपि क्रि- मु.। 8. स्वशासनप्रभा- ता.। 9. --जयः प्रतिज्ञा- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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