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________________ 334] सर्वार्थसिद्धी [919 $ 828चिदुपहन्यन्ते इति चिन्तयतो वासितक्षणचन्दनानुलेपनसमदशिनो वघपरिषहक्षमा मन्यते। 8828. बाह्याभ्यन्तरतपोऽनुष्ठानपरस्य तद्भावनावशेन निस्सारीकृतमूर्तेः पटुतपनतापनिष्पीतसारतरोरिव विरहितच्छायस्य त्वगस्थिशिराजालमात्रतनुयन्त्रस्य प्राणात्यये सत्यप्याहारबसतिभेषजादीनि दीनाभिधानमुखवंवाङ्गसंज्ञादिभिरयाचमानस्य भिक्षाकालेऽपि विधुदुद्योतवद् दुरुपलक्ष्यमूर्तेर्याचनापरिषहसहनमवसीयते। 6829. वायुवदसङ्गादनेकदेशचारिणोऽभ्युपगतंककालसंभोजनस्य वाचंयमस्य तत्समितस्य वा सकृत्स्वतनुदर्शनमात्रतन्त्रस्य पाणिपुटमात्रपात्रस्य बहुषु दिवसेषु बहुषु च गृहेष भिक्षामनवाप्याप्यसंक्लिष्टचेतसो दातृविशेषपरीक्षानिरुत्सुकस्य लाभादप्यलाभो मे परमं तप इति संतुष्टस्यालाभविजयोऽवसेयः।। 830. सर्वाशुचिनिधानमिदमनित्यमपरित्राणमिति शरीरे निःसंकल्पत्वाद्विगतसंस्कारस्य गुणरत्नभाण्डसंचयप्रवर्धनसंरक्षण संधारणकारणत्वादभ्युपगतस्थितिविधानस्याक्षम्रक्षणवद वणानुलेपनवद्वा बहूपकारमाहारमभ्युपगच्छतो विरुद्वाहारपानसेवनवैषम्यजनितवातादिविकाररोगस्य युगपदनेकशतसंख्यव्याधिप्रकोपे सत्यपि तद्वशतितां विजहतो जल्लोषधिप्राप्त्याद्यनेकतपोविशेषद्धियोगे सत्यपि शरीरनिस्स्पृहत्वात्तत्प्रतिकारानपेक्षिणो रोगपरिषहसहनमवगन्तव्यम् । विचार करता है वह बसूलासे छीलने और चन्दनसे लेप करने में समदर्शी होता है, इसलिए उसके वधपरीषहजय माना जाता है। 6 828. जो बाह्य और आभ्यंतर तपके अनुष्ठान करनेमें तत्पर है, जिसने तपकी भावनाके कारण अपने शरीरको सुखा डाला है, जिसका तीक्ष्ण सूर्यके तापके कारण सार व छाया रहित वृक्षके समान त्वचा, अस्थि और शिराजालमात्र से युक्त शरीरयन्त्र रह गया है, जो प्राणीका वियोग होनेपर भी आहार, वसति और दवाई आदिकी दीन शब्द कहकर, मुखकी विवर्णता दिखाकर व संज्ञा आदिके द्वारा याचना नहीं करता तथा भिक्षाके समय भी जिसकी मूर्ति बिजलीकी चमकके समान दुरुपलक्ष्य रहती है ऐसे साधुके याचना परीषहजय जानना चाहिए। 8829. वायुके समान निःसंग होनसे जो अनेक देशोंमें विचरण करता है, जिसने दिनमें एक कालके भोजनको स्वीकार किया है, जो मौन रहता है या भाषासमितिका पालन करता है, एक बार अपने शरीरको दिखलानामात्र जिसका सिद्धान्त है, पाणिपुट ही जिसका पात्र है, बहुत दिन तक या बहुत घरोंमें भिक्षाके नहीं प्राप्त होनेपर भी जिसका चित्त संक्लेशसे रहित है, दाताविशेषको परीक्षा करने में जो निरुत्सुक है तथा लाभसे भी अलाभ मेरे लिए परम तप है इस प्रकार जो सन्तुष्ट है उसके अलाभ परीषहजय जानना चाहिए। 8830. यह सब प्रकारके अशुचि पदार्थोंका आश्रय है, यह अनित्य है और परित्राणसे रहित है इस प्रकार इस शरीरमें संकल्परहित होनेसे जो विगतसंस्कार है, गुणरूपी रत्नोंके पात्रके संचय, वर्धन, संरक्षण और संधारणका कारण होनेसे जिसने शरीरकी स्थितिविधानको भले प्रकार स्वीकार किया है, धुरको ओंगन लगानेके समान या व्रणपर लेप करनेके समान जो बहुत उपकारवाले आहारको स्वीकार करता है, विरुद्ध आहार-पानके सेवनरूप विषमतासे जिसके वातादि विकार रोग उत्पन्न हुए हैं, एक साथ सैकड़ों व्याधियोंका प्रकोप होनेपर भी जो उनके आधीन नहीं हुआ है तथा तपोविशेषसे जल्लौषधि की प्राप्ति आदि अनेक ऋद्धियोंका सम्बन्ध होनेपर भी शरीरसे निस्पृह होनेके कारण जो उनके प्रतीकारकी अपेक्षा नहीं करता उसके रोगपरीषहसहन जानना चाहिए। 1. प्राणवियोगे सत्य- मु.। 2 . तत्समस्य वा आ., दि. 1, दि. 2। 3. - सेषु च मु.। 4. रक्षणकार.. आ., दि 2, ता. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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