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________________ -9198827] नवमोऽध्यायः [333 घ्रादिविविधभीषणध्वनिश्रवणान्निवृत्तभयस्य चतुविधोपसर्गसहनादप्रच्युतमोक्षमार्गस्य वीरासनोत्कुटिकाधासनादविचलितविग्रहस्य तत्कृतबाधान्सहनं निषद्यापरिषह विजय इति निश्चीयते। 8825. स्वाध्यायध्यानाध्वश्रमपरिखेदितस्य मौहूतिकी खरविषमप्रचुरशर्कराकपालसंकटा तिशीतोष्णेषु भूमिप्रदेशेषु निद्रामनुभवतो यथाकृतकपाश्र्वदण्डायितादिशायिनः प्राणिबाधापरिहाराय पतितदारुवद् व्यपगतासुवद परिवर्तमानस्य ज्ञान भावनावहितचेतसोऽनुष्ठितव्यन्तरादिविविधोपसर्गावप्यचलिर्तावग्रहस्यानियमितकाला तत्कृतबाधां क्षममाणस्य शय्या परिषहक्षमा कम्यते। 8826. मिथ्यादर्शनोदृक्तामर्षपरुषावज्ञानिन्दासभ्यवचनानि क्रोधाग्निशिखाप्रवर्धनानि निशृण्वतोऽपि तदर्थेष्वसमाहितचेतसः सहसा तत्प्रतीकारं कर्तुमपि शक्नुवतः पापकर्मविपाकमभिचिन्तयतस्तान्याकर्ण्य तपश्चरणभावनापरस्य कषायविषलवमात्रस्याप्यनवकाशमात्महृदयं कुर्वत आक्रोशपरिषहसहनमवधार्यते।। 8827. निशितविशसनमुशलमुद्गराद्रिप्रहरणताडनादिभिर्व्यापाद्यमानशरीरस्य व्यापादकेषु मनागपि मनोविकारमकुर्वतो मम पुराकृतदुष्कर्मफलमिदमिमे वराकाः किं कुर्वन्ति, शरीरमिवं जलबुर्बुद्वद्विशरणस्वभावं व्यसनकारणमेतैर्बाबाध्यते, संज्ञानदर्शनचारित्राणि मम न केनप्रकारके उपसर्गके सहन करनेसे जो मोक्षमार्गसे च्युत नहीं हुआ है तथा वीरासन और उत्कुटिका आदि आसनके लगानेसे जिसका शरीर चलायमान नहीं हुआ है उसके निषद्याकृत बाधाका सहन करना निषद्यापरीषहजय निश्चित होता है। 8825. स्वाध्याय, ध्यान और अध्वश्रमके कारण थककर जो कठोर, विषम तथा प्रचुरमात्रामें कंकड़ और खपरोंके टुकड़ों से व्याप्त ऐसे अतिशीत तथा अत्युष्ण भूमिप्रदेशोंमें एक मुहूर्तप्रमाण निद्राका अनुभव करता है, जो यथाकृत एक पार्श्व भागसे या दण्डायित आदिरूपसे शयन करता है, करवट लेनेसे प्राणियोंको होनेवाली बाधाका निवारण करने के लिए जो गिरे हए लकड़ीके कुन्देके समान या मुर्दाके समान करवट नहीं बदलता, जिसका चित्त ज्ञानभावनामें व्यन्तरादिके द्वारा किये गये नाना प्रकारके उपसर्गोसे भी जिसका शरीर चलायमान नहीं होता और जो अनियतकालिक तत्कृत बाधाको सहन करता है उसके शय्यापरीषहजय कहा जाता है। 826. मिथ्यादर्शनके उद्रेकसे कहे गये जो क्रोधाग्निकी शिखाको बढ़ाते हैं ऐसे क्रोधरूप, कठोर, अवज्ञाकर, निन्दारूप और असभ्य वचनोंको सुनते हुए भी जिसका उनके विषयमें चित्त नहीं जाता है, यद्यपि तत्काल उनका प्रतीकार करनेमें समर्थ है फिर भी यह सब पापकर्मका विपाक है इस तरह जो चिन्तन करता है, जो उन शब्दोंको सुनकर तपश्चरणकी भावनामें तत्पर रहता है और जो कषायविषके लेशमात्रको भी अपने हृदयमें अवकाश नहीं देता उसके आक्रोशपरीषहसहन निश्चित होता है। 6827. तीक्ष्ण तलवार, मूसर और मुद्गर आदि अस्त्रोंके द्वारा ताड़न और पीड़न आदिसे जिसका शरीर तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है तथापि मारनेवालोंपर जो लेशमात्र भी मनमें विकार नहीं लाता, यह मेरे पहले किये गये दुष्कर्मका फल है, ये बेचारे क्या कर सकते हैं, यह शरीर जलके बुलबुलेके समान विशरण-स्वभाव है, दुःखके कारणको ही ये अतिशय बाधा पहँचाते हैं, मेरे सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्रको कोई नष्ट नहीं कर सकता इस प्रकार जो 1.-संकटादिशी--म,। 2. --पतिततरुदण्डव-- ता.। 3. --तासूवपरि-- म.। 4. ज्ञानपरिभावना-म.।। 5. -नानि शृण्व-- मु., दि. 11 2.-मेतैयाबा-- म. । लगा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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