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________________ 332] सर्वार्थसिद्धौ [919 $ 822शून्यागारवेवकुलतरकोटरशिलागुहादिषु स्वाध्यायध्यानभावनारतिमास्कन्दतो दृष्टश्रुतानुभूतर. तिस्मरणतत्कथाश्रवणकामशरप्रवेशनिर्विवरहृदयस्य प्राणिषु सदा सदयस्यारतिपरिषहजयोऽवसेयः। 8822. एकान्तेष्वारामभवनादिप्रदेशेषु नवयौवनमदविभ्रममदिरापानप्रमत्तासु प्रमदासु बाधमानासु कूर्मवत्संवृतेन्द्रियविकारस्य ललितस्मितमृदुकथितसविलासवीक्षणप्रहसनमवमन्थर'. गमनमन्मथशरव्यापारविफलीकरणस्य स्त्रीबाधापरिषहसहनमवगन्तम् । 8823. दीर्घकालमुषितगुरुकुलब्रह्मचर्यस्याधिगतबन्धमोक्षपदार्थतत्त्वस्य संयमायतनभक्तिहेतोर्देशान्तरातिथेर्गुरुणाभ्यनुज्ञातस्य पवनवन्निःसंगतामङ्गीकुर्वतो बहुशोऽनशनावमौदर्यवत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागादिबाधापरिक्लान्तकायस्य देशकालप्रमाणापेतमध्वगमन संयमविरोधि परिहरतो निराकृतपादावरणस्य परुषशर्कराकण्टकादिव्य धनजातचरणखेवस्थापि सतः पूर्वोचितयानवाहनादिगमनमस्मरतो यथाकालमावश्यकापरिहाणिमास्कन्वतश्चर्यापरिषहसहनमवसेयम। 6824. स्मशानोद्यानशून्यायतनगिरिगुहागह्वरादिष्वनभ्यस्तपूर्वेषु निवसत आदित्यप्रकाश स्वेन्द्रियज्ञानपरीक्षितप्रदेशे कृतनियमक्रियस्य निषद्यां नियमितकालामास्थितवतः सिंहव्यावादित्र आदिसे रहित शून्यघर, देवकुल, तरुकोटर और शिलागुफा आदिमें स्वाध्याय, ध्यान और भावनामें लीन है, पहले देखे हुए, सुने हुए और अनुभव किये हुए विषयभोगके स्मरण, विषयभोग सम्बन्धी कथाके श्रवण और कामशर प्रवेशके लिए जिसका हृदय निश्छिद्र है और जो प्राणियोंके ऊपर सदाकाल सदय है उसके अरतिपरीषहजय जानना चाहिए। 8822. एकान्त ऐसे बगीचा और भवन आदि स्थानों में नवयौवन, मदविभ्रम और मदिरापानसे प्रमत्त हुई स्त्रियोंके द्वारा बाधा पहुंचाने पर कछुएके समान जिसने इन्द्रिय और हृदयके विकारको रोक लिया है तथा जिसने मन्द मुस्कान, कोमल सम्भाषण, तिरछी नजरोंसे देखना, हँसना, मदभरी धीमी चालसे चलना, और कामवाण मारना आदिको विफल कर दिया है उसके स्त्रीबाधापरीषहजय जानना चाहिए। 6823. जिसने दीर्घकाल तक गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्यको धारण किया है, जिसने बन्धमोक्ष पदार्थोंके स्वरूपको जान लिया है, संयमके आयतन शरीरको भोजन देनेके लिए जो देशान्तरका अतिथि बना है, गुरुके द्वारा जिसे स्वीकृति मिली है, जो वायुके समान निःसंगताको स्वीकार करता है, बहत बार अनशन, अवमौदर्य, वत्तिपरिसंख्यान और रसपरित्याग आदि जन्य बाधाके कारण जिसका शरीर परिक्लान्त है, देश और कालके प्रमाणसे रहित तथा संयमविरोधी मार्गगमनका जिसने परिहार कर दिया है, जिसने खड़ाऊँ आदिका त्याग कर दिया है, तीक्ष्ण कंकड़ और काँटे आदिके बिंधनेसे चरणोंमें खेदके उत्पन्न होनेपर भी पहले योग्य यान और वाहन आदिसे गमन करनेका जो स्मरण नहीं करता है तथा जो यथाकाल आवश्यकोंका परिपूर्ण परिपालन करता है उसके चर्यापरोषहजय जानना चाहिए। $ 824. जिनमें पहले रहनेका अभ्यास नहीं किया है ऐसे श्मशान, उद्यान, शून्यघर गिरिगुफा और गह्वर आदिमें जो निवास करता है, आदित्यके प्रकाश और स्वेन्द्रिय ज्ञानसे परीक्षित प्रदेशमें जिसने नियक्रिया की है. जो नियतकाल निषद्या लगाकर बैठता है. ह और व्याघ्र आदिकी नानाप्रकारकी भीषण ध्वनिके सुनने से जिसे किसी प्रकारका भय नहीं होता, चार 1. 'सुदपरिचिदाणभूदा सव्वस्य वि कामभोगबंधकहा।' .-समयप्रा. गा. 4। 2. संहृते-- मु. । 3. पदमन्थर- म.। 4. --करणचरणस्य आ., दि. 1, दि. 2। 5. --परिक्रान्त- मु.। 6. --व्यथन- मु., दि. 1, दि. 2। 7. प्रतिष आदित्यस्येन्द्रियज्ञानप्रकाशपरीक्षितप्रदेशे इति पाठः। 8. --देशे प्रकृत- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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