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________________ [331 --9198 821] नवमोऽध्यायः हिमानीपतनशीतलानिल'संपाते तत्प्रतिकारप्राप्ति प्रति निवृत्तेच्छस्य पूर्वानुभूतशीतप्रतिकारहेतुवस्तूनामस्मरतो ज्ञानभावनागर्भागारे वसतः शीतवेदनासहनं परिकीर्त्यते ।। 818. निवाते निर्जले ग्रीष्मरविकिरणपरिशुष्कपतितपर्णव्यपेतच्छायातरुण्यटव्यन्तरे यदच्छयोपनिपतितस्यानशनाद्यभ्यन्तरसाधनोत्पादितदाहस्य दवाग्निदाहपरुषवातातपजनितगलतालुशोषस्य तत्प्रतीकारहेतून् बहूननुभूतानचिन्तयतः प्राणिपीडापरिहारावहितचेतसश्चारित्ररक्षण. मुष्णसहनमित्युपवर्ण्यते। $819. 'दंशमशक' ग्रहणमुपलक्षणम् । यथा “काकेभ्यो रक्ष्यतां सपिः' इति उपघातकोप लक्षणं काकग्रहणं, तेन वंशमशकमक्षिकापिशुकपुत्तिकामत्कुणकीटपिपीलिकावृश्चिकादयो गृह्यन्ते । तत्कृतां बाधामप्रतीकारां सहमानस्य तेषां बाधां त्रिधाप्यकुर्वाणस्य निर्वाणप्राप्तिमात्रसंकल्पप्रावरणस्य तद्वदनासहनं दंशमशकपरिषहक्षमेत्युच्यते । $ 820. जातरूपवन्निष्कलंकजातरूपधारणमशक्यप्रार्थनीयं याचनरक्षहिंसनादिदोषविनिर्मुक्तं निष्परिग्रहत्वान्निर्वाणप्राप्ति प्रत्येकं साधनमनन्यबाधनं नान्यं बिभ्रतो मनोविक्रियाविप्लुतिविरहात् स्त्रीरूपाण्यत्यन्ताशुचिकुणपरूपेण भावयतो रात्रिन्दिवं ब्रह्मचर्यमखण्डमातिष्ठमानस्याचेलवतधारणमनवद्यमवगन्तव्यम। __8821. संयतस्येन्द्रियेष्टविषयसंबन्धं प्रति निरुत्सुकस्य गीतनृत्यवादित्रादिविरहितेषु नहीं हैं, वृक्षमूल, चौपथ और शिलातल आदिपर निवास करते हुए बर्फके गिरने पर और शीतल हवाका झोंका आनेपर उसका प्रतीकार करनेको इच्छासे जो निवृत्ति है, पहले अनुभव किये गये शीतके प्रतीकारके हेतुभूत वस्तुओंका जो स्मरण नहीं करता और जो ज्ञानभावनारूपी गर्भागारमें निवास करता है उसके शीतवेदनाजय प्रशंसाके योग्य है। 6818. निर्वात और निर्जल तथा ग्रीष्मकालीन सूर्य की किरणोंसे सूख कर पत्तोंके गिर जानेसे छायारहित वृक्षोंसे युक्त ऐसे वनके मध्य जो अपनी इच्छानुसार प्राप्त हुआ है, अनशन आदि आभ्य न्तर साधनवश जिसे दाह उत्पन्न हुई है, दवाग्निजन्य दाह, अतिकठोर वायु और आतपके कारण जिसे गले और तालुमें शोष उत्पन्न हुआ है, जो उसके प्रतीकारके बहुत-से अनुभूत हेतुओंको जानता हुआ भी उनका चिन्तन नहीं करता है तथा जिसका प्राणियोंकी पीडाके परिहारमें चित्त लगा हुआ है उस साधुके चारित्रके रक्षणरूप उष्णपरीषहजय कही जाती है। 8819. सूत्रमें 'दंशमशक' पदका ग्रहण उपलक्षण है। जैसे 'कौओंसे घीको रक्षा करनी चाहिए' यहाँ 'काक' पदका ग्रहण उपचातक जितने जोव हैं उनका उपलक्षण है, इसलिए 'दंशमशक' पदसे दंशमशक, मक्खी, पिस्सू, छोटी मक्खी, खटमल, कीट, चींटी और बिच्छु आदिका ग्रहण होता है। जो इनके द्वारा की गयी बाधाको विना प्रतीकार किये सहन करता है, मन वचन और कायसे उन्हें बाधा नहीं पहुंचाता है और निर्वाणकी प्राप्तिमात्र संकल्प ही जिसका ओढ़ना है उसके उनकी वेदनाको सह लेना दशमशक परीषहजय कहा जाता है। 8820. बालकके स्वरूपके समान जो निष्कलंक जातरूपको धारण करनेरूप है, जिसका याचना करनेसे प्राप्त होना अशक्य है, जो याचना, रक्षा करना और हिंसा आदि दोषोंसे रहित है, जो निष्परिग्रहरूप होनेसे निर्वाण प्राप्तिका एक-अनन्य साधन है और जो दिन-रात अखण्ड ब्रह्मचर्यको धारण करता है उसके निर्दोष अचेलव्रत धारण जानना चाहिए। $ 821. जो संयत इन्द्रियोंके इष्ट विषयसम्बन्धके प्रति निरुत्सुक है, जो गीत, नृत्य और 1, --शीतानिल- आ., दि. 1, दि. 2। 2. - ग्रहणं दंशमशकोपलक्षणं । यथा आ. दि. 1, दि. 2, ता.। 3. उपघातोप-- मु.। 4. -शक्यमप्रार्थ्य-- ता., ना., दि. 2, आ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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