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________________ -9186 813] नवमोऽध्यायः [329 प्रमादो न कदाचिदपि भवति । 8810. अयं जिनोपदिष्टो धर्मो हिंसालक्षणः सत्याधिष्ठितो विनयमूलः । अमावलो ब्रह्मचर्यगुप्त उपशमप्रधानी नियतिलक्षणो निष्परिग्रहतालम्बनः । अस्यालाभादनादिसंसारे जीवाः परिभ्रमन्ति दुष्कर्मविपाकजं दुःखमनुभवन्तः । अस्य पुनः प्रतिलम्भे विविवाभ्युदयप्राप्तिपूर्विका निःश्रेयसोपलब्धिनियतेति चिन्तनं धर्मस्वाख्यातत्वानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतो धर्मानुरागात्सदा प्रतियत्लो भवति । 811. एवमनित्यत्वाद्यनुप्रेक्षासंनिधाने उत्तमक्षमादिधारणान्महान् संवरो भवति । मध्ये 'अनुप्रेक्षा'वचनमुभयार्थम् । अनुप्रेक्षाः हि भावयन्नुत्तमक्षमादींश्च प्रतिपालयति परीषहांश्च जेतुमुत्सहते । 8812. के पुनस्ते परिषहाः किमयं वा ते सहान्त इतीदमाह-- मार्गाच्यवननिर्जराथ परिषोढव्याः परीषहाः ॥8॥ 8813. संवरस्य प्रकृतत्वात्तेन मार्गो विशिष्यते । संवरमार्ग इति । तदच्यवनाथ निर्जरार्थ च परिषोढव्याः परीषहाः। क्षुत्पिपासादिसहनं कुर्वन्तः जिनोपदिष्टान्मार्गावप्रच्यवमानास्तन्मार्गपरिक्रमणपरिचयेन कर्मागमद्वारं संवृण्वन्त औपक्रमिकं कर्मफलमनुभवन्तः क्रमेण निर्जीर्णकर्माणो मोक्षमाप्नुवन्ति। प्रमाद नहीं होता। 8810. जिनेन्द्रदेवने यह जो अहिंसालक्षण धर्म कहा है, सत्य उसका आधार है, विनय उसकी जड़ है, क्षमा उसका बल है, ब्रह्मचर्यसे रक्षित है, उपशमकी उसमें प्रधानता है, नियति उसका लक्षण है, परिग्रह रहितपना उसका आलम्बन है। इसकी प्राप्ति नहीं होनेसे दुष्कर्म विपाकसे जायमान दुःखको अनुभव करते हुए ये जीव अनादि संसारमें परिभ्रमण करते हैं। परन्तु इसका लाभ होने पर नाना प्रकारके अभ्युदयोंकी प्राप्तिपूर्वक मोक्षको प्राप्ति होना निश्चित है ऐसा चिन्तन करना धर्मस्वाख्यातत्वानुप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके धर्मानुरागवश उसकी प्राप्तिके लिए सदा यत्न होता है। 8811. इस प्रकार अनित्यादि अनुप्रेक्षाओंका सान्निध्य मिलने पर उत्तमक्षमादिके धारण करनेसे महान् संवर होता है । अनुप्रेक्षा दोनोंका निमित्त है इसलिए 'अनुप्रेक्षा' वचन मध्यमें दिया है । अनुप्रेक्षाओंका चिन्तन करता हुआ यह जोव उत्तमक्षमादिका ठीक तरहसे पालन करता है और परीषहोंको जीतनेके लिए उत्साहित होता है। 8812. वे परीषह कौन-कौन हैं और वे किसलिए सहन किये जाते हैं, यह बतलानेके लिए यह सूत्र कहते हैं मार्गसे च्युत न होनेके लिए और कोको निर्जरा करनेके लिए जो सहन करने योग्य हो वे परीषह हैं ॥8॥ 6813. संवरका प्रकरण होनेसे वह मार्गका विशेषण है, इसलिए सूत्रमें आये हुए ‘मार्ग' पदसे संवरमार्गका ग्रहण करना चाहिए । उससे च्युत न होने के लिए और निर्जराके लिए सहन करने योग्य परीषह होते हैं । क्षुधा, पिपासा आदिको सहन करनेवाले, जिनदेवके द्वारा कहे हुए मार्गसे नहीं च्युत होनेवाले, मार्गके सतत अभ्यासरूप परिचयके द्वारा कर्मागमद्वारको संवृत करनेवाले तथा औपक्रमिक कर्मफलको अनुभव करनेवाले क्रमसे कर्मोकी निर्जरा करके मोक्षको प्राप्त होते हैं। 1. सदा कृतप्रति- ता.। 2. वा सह्य- मु.। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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