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________________ -9178807] नवमोऽध्यायः [327 संस्मरतः शरीरनिर्वेदो भवति । निविण्णश्च जन्मोदधितरणाय चित्तं समाधत्ते । 805. आस्रवसंवरनिर्जराः पूर्वोक्ता अपि इहोपन्यस्यन्ते तद्गतगुणदोषभावनार्थम् । तद्यथा—आस्रवा इहामुत्रापाययुक्ता महानदीस्रोतोवेगतीक्ष्णा इन्द्रियकषाया व्रतादयः। तत्रेन्द्रियाणि तावत्स्पर्शनादीनि वनगजवायसपन्नगपतङ्गहरिणादीन् व्यवसनार्णवमवगाहयन्ति तथा कषायादयोऽपीह वधबन्धापयशःपरिक्लेशादीन् जनयन्ति । अमुत्र च नानागतिषु बहुविधदुःखप्रज्वलितासु परिभ्रमयन्तीत्येवमास्रवदोषानुचिन्तनमास्त्रवानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्य चिन्तयतः क्षमादिषु श्रेयस्त्वबुद्धिर्न प्रच्यवते । सर्व एते आस्रवदोषाः कूर्मवत्संवृतात्मनो न भवन्ति। $806. यथा महार्णवे नावो "विवरपिधानेऽसति क्रमात् सतजलाभिप्लवे सति तदाश्रयाणां विनाशोऽवश्यंभावी, छिद्रपिधाने च निरुपद्रवमभिलषितदेशान्तरप्रापणं, तथा कर्मागमद्वारसंवरणे सति नास्ति श्रेयःप्रतिबन्ध इति संवरगुणानुचिन्तनं संवरानु प्रेक्षा। एवं ह्यस्य चिन्तयतः संवरे नित्योयुक्तता भवति । ततश्च निःश्रेयसपदप्राप्तिरिति। 8807. निर्जरा वेदनाविपाक इत्युक्तम् । सा द्वेधा-अबुद्धिपूर्व कुशलमूला चेति । तत्र नरकादिषु कर्मफलविपाकजा अबुद्धिपूर्वा सा अकुशलानुबन्धा । परिषहजये कृते कुशलमूला सा शुभानुबन्धा निरनुबन्धा चेति । इत्येवं निर्जराया गुणदोषभावनं निर्जरानुप्रेक्षा । एवं ह्यस्यानुहोता है और निविण्ण होकर जन्मोदधिको तरनेके लिए चित्तको लगाता है। 805. आस्रव, संवर और निर्जराका कथन पहले कर आये हैं तथापि उनके गुण और दोषोंका विचार करनेके लिए यहाँ उनका फिरसे उपन्यास किया गया है। यथा-आस्रव इस लोक और परलोकमें दु.खदायी है। महानदीके प्रवाहके वेगके समान तीक्ष्ण हैं तथा इन्द्रिय, कषाय और अव्रतरूप हैं। उनमें से स्पर्शनादिक इन्द्रियाँ वनगज, कौआ, सर्प, पतंग और हरिण आदिको दुःख रूप समुद्रमें अवगाहन कराती हैं । कषाय आदिक भी इस लोकमें वध, बन्ध अपशय और क्लेशादिक दुःखोंको उत्पन्न करते हैं, तथा परलोकमें नाना प्रकारके दुःखोंसे प्रज्वलित नाना गतियोंमें परिभ्रमण कराते हैं । इस प्रकार आस्रवके दोषोंका चिन्तन करना आस्रवानप्रेक्षा है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके क्षमादिकमें कल्याणरूप बुद्धिका त्याग नहीं होता है, तथा कछुएके समान जिसने अपनी आत्माको संवृत कर लिया है उसके ये सब आस्रवके दोष नहीं होते हैं। 8806. जिस प्रकार महार्णवमें नावके छिद्रके नहीं ढके रहनेपर क्रमसे झिरे हुए जलसे व्याप्त होनेपर उसके आश्रयसे बैठे हुए मनुष्योंका विनाश अवश्यम्भावी है और छिद्रके ढंके रहने पर निरुपद्रवरूपसे अभिलषित देशान्तरका प्राप्त होना अवश्यम्भावी है उसी प्रकार कर्मागमके द्वारके ढंके होनेपर कल्याणका प्रतिबन्ध नहीं होता। इस प्रकार संवरके गुणोंका चिन्तन करना संवरानुप्रेक्षा है । इस प्रकार चिन्तन करनेवाले इस जीवके संवरमें निरन्तर उद्युक्तता होती है और इससे मोक्षपदकी प्राप्ति होती है। 8807. वेदना विपाकका नाम निर्जरा है यह पहले कह आये हैं। वह दो प्रकारकी हैअबद्धिपर्वा और कुशलमूला । नरकादि गतियोंमें कर्मफलके विपाकसे जायमान जो अबुद्धिपूर्वा निर्जरा होती है वह अकुशलानुबन्धा है । तथा परीषहके जीतनेपर जो निर्जरा होती है वह कूशलमला निर्जरा है । वह शुभानुबन्धा और निरनुबन्धा होती है । इस प्रकार निर्जराके गुणदोषका 1. तद्गुण- मु.। 2. --बन्धपरि- मु., ता.। 3. --तासु भ्रम-- मु.। 4. विवरापिधाने सति मु. । 5. --पाकजा इत्यु- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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