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________________ 314] सर्वार्थसिद्धौ [8123 6 7798779. आह अभिहितोऽनुभवबन्धः । इदानी प्रदेशबन्धो वक्तव्यः। तस्मिश्च वक्तव्ये सति इमे निर्देष्टव्याः-किहेतवः कदा कुतः किस्वभावाः कस्मिन् किपरिमाणाश्चेति ? तदर्थमिदं क्रमेण परिगृहीतप्रश्नापेक्षभेदं सूत्र प्रणीयतेउसका कारण स्वतन्त्र है यह निश्चित होता है । अब रही सूत्रकारके विपाकको अनुभव कहनेकी बात सो इस कथनमें भी यही अभिप्राय छिपा हआ है। सब जीवोंका विपाक एक प्रकारका नहीं होता, वह न्यूनाधिक देखा जाता है और विपाककी यह न्यूनाधिकता अकारण नहीं हो सकती। यही कारण है कि सूत्रकार अनुभवबन्धकी स्वतन्त्र परिगणना करते हैं और उसकी पुष्टि विपाकके द्वारा दिखलाते हैं । इस प्रकार अनुभवबन्ध क्या है और उसे स्वतन्त्र क्यों कहा इसका विचार किया। फिर भी यह अनुभाग बन्धकालमें जैसा प्राप्त होता है एकान्ततः वैसा ही नहीं बना रहता है। अपने अवस्थान कालके भीतर वह बदल भी जाता है और नहीं भी बदलता है। बदलनेसे. इसकी तीन अवस्थाएँ होती हैं--संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण । संक्रमण अवान्तर प्रकृतियोंमें होता है, मूल प्रकृतियोंमें नहीं होता। उसमें भी आयुकर्मको अवान्तर प्रकृतियों का संक्रमण नहीं होता और दर्शनमोहनीयका चारित्रमोहनीय रूपसे तथा चारित्रमोहनीयका दर्शनमोहनीयरूपसे संक्रमण नहीं होता। संक्रमणके चार भेद हैं—प्रकतिसंक्रमण, स्थितिसंक्रमण, अनु भागसंक्रमण और प्रदेशसंक्रमण । जहाँ प्रकृतिसंक्रमण और प्रदेशसंक्रमणकी मुख्यता होती है वहाँ वह संक्रमण शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है और जहाँ मात्र स्थितिसंक्रमण अनुभागसंक्रमण होता है वहाँ वह उत्कर्षण और अपकर्षण शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाता है। बन्धकालमें जो स्थिति और अनुभाग प्राप्त होता है उसमें कमी होना अपकर्षण है और घटी हुई स्थिति व अनुभागमें वृद्धि होना उत्कर्षण है । इस प्रकार विविध अवस्थाओंमें-से गुजरते हुए उदयकालमें जो अनुभाग रहता है उसका परिपाक होता है । अनुदय अवस्थाको प्राप्त प्रकृतियोंका परिपाक उदय अवस्थाको प्राप्त सजातीय प्रकृतिरूपसे होता है । इसके विषयमें यह नियम है कि उदयवाली प्रकृतियोंका फल स्वमुखसे मिलता है और अनुदयवाली प्रकृतियोंका फल परमुखसे मिलता है। उदाहरणार्थ -साताका उदय रहने पर उसका भोग सातारूपसे ही होता है, किन्त तब असाता स्तिबक संक्रमण द्वारा सातारूपसे परिणमन करती रहती है, इसलिए इसका उदय परमुखसे होता है । उदय कालके एक समय पहले अनुदयरूप प्रकृतिके निषेकका उदयको प्राप्त हुई प्रकृतिरूपसे परिणम जाना स्तिबुक संक्रमण है। जो प्रकृतियाँ जिस कालमें उदयमें नहीं होती हैं, किन्तु सत्तारूपसे विद्यमान रहती हैं उन सबका प्रति समय इसी प्रकार परिणमन होता रहता है। घाति और अघातिके भेदसे अनुभाग दो प्रकारका होता है । लता, दारु, अस्थि और शैल यह चार प्रकारका घाति प्रकृतियोंका अनुभाग है । अघःति प्रकृतियोंके पुण्य और पाप ऐसे दो भेद हैं । पुण्य प्रकृतियोंका अनुभाग गुड़, खाँड़, शर्करा और अमृत इन चार भागोंमें बँटा हुआ है तथा निम्ब, कांजीर, विष और हलाहल यह चार प्रकारका पाप प्रकृतियोंका अनुभाग है। इस प्रकार सामान्यरूपसे अनुभागबन्धका विचार किया। 8779. अनुभवबन्धका कथन किया ! अब प्रदेशबन्धका कथन करना है। उसका कथन करते समय इतनी बातें निर्देश करने योग्य हैं-प्रदेशबन्धका हेतु क्या है, वह कब होता है, उसका निमित्त क्या है, उसका स्वभाव क्या है, वह किसमें होता है और उसका परिणमन क्या इस प्रकार क्रमसे इन प्रश्नोंको लक्ष्यमें रखकर आगेका सूत्र कहते हैं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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