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________________ -81238778] अष्टमोऽध्यायः [313 च' इति वक्ष्यते ततश्च भवति अन्यतश्चेति सूत्रार्थो योजितः । किमर्थमिह निर्जरानिर्देशः क्रियते, संवरात्परा निर्देष्टव्या उद्देशवत् ? लघ्वर्थमिह वचनम् । तत्र हि पाठे 'विपाकोऽनुभवः' इति पुनरनुवादः कर्तव्यः स्यात् । किसलिए किया है, क्योंकि उद्देश्यके अनुसार उसका संवरके बाद उल्लेख करना ठीक होता ? समाधान-थोड़ेमें बोध करानेके लिए यहाँ निर्जराका उल्लेख किया है । संवरके बाद पाठ देने पर 'विपाकोऽनुभवः' इसका फिरसे अनुवाद करना पड़ता। विशेषार्थ--अनुभव, अनुभाग या फलदानशक्ति इनका एक ही अर्थ है । कर्मका बन्ध होते समय जिस कर्मकी जो प्रकुति होती है उसके अनुरूप उसे फलदानशक्ति प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ-ज्ञानावरणकी ज्ञानको आवृत करनेकी प्रकृति है, इसलिए इसे इसीके अनुरूप फलदान शक्ति प्राप्त होती है। प्रकृतिका अर्थ स्वभाव है और अनुभवका अर्थ है उस स्वभावके अनुरूप उसे भोगना। साधारणत: यहाँ यह कहा जा सकता है कि यदि प्रकृति और अनुभवका यही अर्थ है तो इन्हें अलग-अलग मानना उचित नहीं है, क्योंकि जिस कर्मकी जैसी प्रकृति होगी उसके अनुरूप उसका भोग सुतरां सिद्ध है। इसलिए प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्ध ये दो स्वतन्त्र सिद्ध नहीं होते, किन्तु अनुभवबन्धका अन्तर्भाव प्रकृतिबन्धमें ही हो जाता है । यदि कहा जाय कि ज्ञानावरण आदि रूपसे कर्मकी प्रकृति फलदानशक्तिके निमित्तसे होती है, इसलिए प्रकृतिबन्धमें अनुभवबन्धका अन्तर्भाव नहीं किया जा सकता सो इसका यह समाधान है कि जबकि प्रकृतिबन्धका कारण योग है और अनुभवबन्धकी हीनाधिकताका कारण कषाय है तब फिर फलदान शक्तिके निमित्तसे कर्मकी प्रकृति बनती है यह कैसे माना जा सकता है। थोड़ी देरको यह मान भी लिया जाय तब भी यह प्रश्न खड़ा रहता है कि प्रकृतिबन्ध और अनुभवबन्धको अलग अलग क्यों माना गया है और उनके अलग अलग माननेके योग और कषाय दो स्वतन्त्र कारण क्यों बतलाये गये हैं। सूत्रकारने बन्धके चार भेद करके भी विपाक अर्थात् कर्मभोगको अनुभव कहा है और उसे प्रकृतिके अनुरूप बतलाया है । इससे तो यही सिद्ध होता है कि वस्तुतः ये दो नहीं हैं, किन्तु बन्ध समयकी अपेक्षा जिसका नाम प्रकृति है उदयकाल की अपेक्षा उसे ही अनुभव कहते हैं ? समाधान यह है कि कर्मबन्धके समय कर्मका विविधरूपसे विभाग योगके निमित्तसे ही होता है और विभागको प्राप्त हुए कर्मोमें हीनाधिक फलदानशक्ति का प्राप्त होना कषायके निमित्तसे होता है, इसलिए ये दोनों स्वतन्त्र माने गये हैं। यद्यपि यह ठीक है कि बिना शक्तिके किसी कर्मकी प्रकृति नहीं बन सकती। स्वतन्त्र प्रकति कहनेसे उसकी शक्तिका बोध हो ही जाता है, फिर भी ऐसी शक्तिकी एक सीमा होती है। उसका उल्लंघन कर जो न्यूनाधिक शक्ति पायो जाती है उसीका बोध कराना अनुभागबन्धका काम है। उदाहरणार्थ ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें सातावेदनीयका प्रकृतिबन्ध होता है और यह प्रकृतिबन्ध एक नियत मर्यादामें अनुभागको लिये ही होता है, फिर भी यहाँ अनुभागबन्धका निषेध किया गया है सो इसका कारण यह है कि जो अनुभाग सकषाय अवस्थामें सातावेदनीयका प्राप्त होता था वह यहाँ प्राप्त नहीं होता है। सकषाय अवस्थामें प्राप्त होनेवाले जघन्य अनुभागसे भी यह अनन्तवें भागमात्र होता है। इतना कम अनुभाग सकषाय अवस्थामें नहीं प्राप्त हो सकता। इससे प्रकृतिबन्धसे अनुभागबन्धके अलग कहनेकी उपयोगिता सिद्ध हो जाती है। तात्पर्य यह है कि प्रकृतिबन्धमें कर्मभेद को स्वीकार करके भी न्यूनाधिक फलदान शक्ति नहीं स्वीकार की गयी है, किन्तु अनुभागबन्धमें इसका और इसके कारणका स्वतन्त्र रूपसे विचार किया जाता है, इसलिए प्रकृतिबन्ध और उसका कारण स्वतन्त्र है तथा अनुभागबन्ध और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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