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________________ -8124 8780] अष्टमोऽध्यायः [315 नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥24॥ 8780. नाम्नः प्रत्यया नामप्रत्ययाः 'नाम' इति सर्वाः कर्मप्रकृतयोऽभिधीयन्ते ; 'स यथानाम' इति वचनात् । अनेन हेतुभाव उक्तः । सर्वेषु भवेषु सर्वतः 'दृश्यन्ते अन्यतोऽपि' इति तसि कृते सर्वतः । अनेन कालोपादानं इति कृतम् । एकैकस्य हि जीवस्यातिक्रान्ता अनन्ता भवा आगामिनः संख्येया असंख्येया अनन्तानन्ता वा भवन्तीति । योगविशेषानिमित्तात्कर्मभावेन पुद्गला आदीयन्त इति निमित्तविशेषनिर्देशः कृतो भवति । 'सूक्ष्म' आदिग्रहणं कर्मग्रहणयोग्यपुद्गलस्वभावानुवर्तनार्थम्, ग्रहणयोग्याः पुद्गलाः सूक्ष्मा न स्थूला इति । 'एकक्षेत्रावगाह'वचनं क्षेत्रान्तरनिवृत्त्यर्थम् । "स्थिताः' इति वचनं क्रियान्तरनिवृत्त्यर्थम्, स्थिता न गच्छन्त इति । 'सर्वात्मप्रदेशेषु' इति वचनमाधारनिर्देशार्थ नैकप्रदेशादिषु कर्मप्रदेशा दर्तन्ते । क्व तहि ? ऊर्ध्वमस्तिर्यक् च सर्वेष्वात्मप्रदेशेषु व्याप्य स्थिता इति । 'अनन्तानन्तप्रदेश'वचनं परिमाणान्तरव्यपोहार्थम्, न संख्येया न चासंख्येया नाप्यनन्ता इति । ते खलु पुद्गलस्कन्धा अभव्यानन्तगुणाः सिद्धानन्तभागप्रमितप्रदेशा घनामुलस्यासंख्येयभागक्षेत्रावगाहिन एकद्वित्रिचतुःसंख्येयसमयस्थितिकाः पञ्चवर्णपञ्चरस-द्विगन्ध-चतःस्पर्शस्वभावा अष्टविधकर्मप्रकृतियोग्या योगवशादात्मनात्मसाक्रियन्ते। इति प्रदेश-बन्धः समासतो वेदितव्यः । कर्म प्रकृतियोंके कारणभूत प्रति समय योगविशेषसे सूक्ष्म, एकक्षेत्रावगाही और स्थित अनन्तानन्त पुद्गल परमाणु सब आत्मप्रदेशोंमें (सम्बन्धको प्राप्त) होते हैं ॥24॥ 8780. नामप्रत्यया:-नामके कारणभूत कर्मपरमाणु नामप्रत्यय कहलाते हैं। 'नाम' इस पद द्वारा सब कर्मप्रकृतियाँ कही जाती हैं । जिसकी पुष्टि ‘स यथानाम' इस सूत्रवचनसे होती है। इस पदद्वारा हेतुका कथन किया गया है। सर्वतः-प्रदेशबन्ध सब भवोंमें होता है। 'सर्वेषु भतेषु इति सर्वत:' यह इसकी व्युत्पत्ति है । सर्व शब्दसे 'दृश्यन्तेऽन्यतोऽपि' इस सूत्र द्वारा तसि प्रत्यय करनेपर सर्वत: पद बनता है । इस पदद्वारा कालका ग्रहण किया गया है। एक-एक जीवके व्यतीत हए अनन्तानन्त भव होते हैं और आगामी संख्यात, असंख्यात व अनन्तानन्त भव होते हैं। योगविशेषात-योगविशेषरूप निमित्तसे कर्मरूप पूदगल ग्रहण किये जाते हैं। इस पद द्वारा निमित्तविशेषका निर्देश किया गया है । कर्मरूपसे ग्रहण योग्य पुद्गलोंका स्वभाव दिखलानेके लिए सूक्ष्म आदि पदका ग्रहण किया है । ग्रहणयोग्य पुद्गल सूक्ष्म होते हैं स्थूल नहीं होते। क्षेत्रान्तरका निराकरण करने के लिए 'एकक्षेत्रावगाह' वचन दिया है। क्रियान्तरकी निवत्तिके लिए 'स्थिता:' वचन दिया है । ग्रहणयोग्य पुद्गल स्थित होते हैं गमन करते हुए नहीं। आधारनिर्देश करनेके लिए 'सर्वात्मप्रदेशेषु' वचन दिया है । एकप्रदेश आदिमें कर्मप्रदेश नहीं रहते । फिर कहाँ रहते हैं ? ऊपर, नीचे, तिरछे सब आत्मप्रदेशोंमें व्याप्त होकर स्थित होते हैं। दूसरे परिमाणका वारण करनेके लिए अनन्तानन्तप्रदेश बचन दिया है। ये न संख्यात होते हैं, न असंख्यात होते हैं और न अनन्त होते हैं । अभव्योंसे अनन्तगुणे और सिद्धोंके अनन्तवें भागप्रमाण संख्यावाले, घनांगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रकी अवगाहनावाले, एक, दो, तीन, चार, संख्यात और असंख्यात समयकी स्थितिवाले तथा पाँच वर्ण, पाँच रस, दो गन्ध और चार स्पर्शवाले वे आठ प्रकारकी कर्मप्रकृतियोंके योग्य कर्मस्कन्ध योगविशेषसे आत्माद्वारा आत्मसात् किये जाते हैं। इस प्रकार संक्षेपमें प्रदेशबन्ध जानना चाहिए। 1. --क्रान्ता अनन्तातन्ता भवाः ता., ना.। 2. --असंख्येया अनन्ता वा ता., ना.। 3. वशादात्मसा- आ,। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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