SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 422
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 302] सर्वार्थसिद्धौ [8198751 आदिक तीन भेद हैं। मिथ्यात्व समीचीन दर्शनका प्रतिपक्ष कर्म है। यह जीव अनादि कालसे मिथ्यादृष्टि हो रहा है। इसे योग्य द्रव्यादिकका निमित्त मिलनेपर ही समीचीन दर्शनका श्रद्धान होता है। सर्वप्रथम यह श्रद्धान इसके प्रतिपक्षभूत मिथ्यात्व कर्मके उपशमसे ही होता है । साधारणतः संसार में रहनेका काल जब अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण शेष रहता है तब यह होता है पहले नहीं होता । इतने कालके शेष रहने पर होना ही चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है। इससे भी कम कालके शेष रहने पर यह हो सकता है । इसका नाम प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शनका अर्थ है समीचीन दर्शन । जैनदर्शनके अनुसार व्यक्ति-स्वातन्त्र्यकी प्राणप्रतिष्ठा करनेवाला और आत्मदर्शन करानेवाला दर्शन समीचीन दर्शन माना गया है । जब इस प्रकारका सम्यग्दर्शन होता है तब इस दर्शनका प्रतिपक्षभूत कर्म तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है । जिनके नाम मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृतिमिथ्यात्व होते हैं । प्रथमका वही काम है। दसरा और तीसरा अपने नामानुसार काम करते हैं । अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्व मिश्र परिणामके होने में निमित्त होता है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व समीचीन दर्शनरूप परिणामको सदोष बनाने में निमित्त होता है। इस प्रकार एक मिथ्यात्व कर्म सम्यक्त्वका निमित्त पाकर तीन भागों में विभक्त हो जाता है, इसलिए बन्धकी अपेक्षा दर्शनमोहनीय एक होकर भी सत्ताकी अपेक्षा वह तीन प्रकारका माना गया है । मोहनीयका दूसरा भेद चारित्रमोहनीय है । व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी प्राणप्रतिष्ठा करनेवाला दर्शन ही सम्यग्दर्शन है यह हम पहले बतला आये हैं । अत: हमारा इस दर्शनके अनुरूप जो आचार होता है वही सदाचार माना जा सकता है, अन्य नहीं। यही कारण है कि जैनदर्शनके अनुसार स्वावलम्बनके अनुरूप आचारको ही सदाचार कहा गया है । इसी सदाचारका दूसरा नाम सच्चारित्र है । जो कर्म इस सच्चारित्रके होने में बाधक होता है उसे ही आगममें चारित्रमोहनीय कहा है । इसके मूल भेद दो हैं-कषायवेदनीय और अकषायवेदनीय । अकषायवेदनोय देशघाति कर्म होनेसे यह सम्यक् चारित्रकी प्राप्तिमें बाधक नहीं है। कषायवेदनीयक चार भद है। उनमें-से अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ व्यक्तिस्वातव्यके अनुरूप स्वावलम्बनकी धाराका जीवनमें महत्त्व प्रस्थापित नहीं होने देता। इसीसे इसे अनन्त अर्थात् संसारका कारण कहा हैं । व्यक्तिस्वातन्त्र्य और स्वावलम्बनका अविनाभाव सम्बन्ध है। जीवन में व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी श्रद्धा होनेपर स्वावलम्बनका महत्त्व अपने आप समझमें आने लगता है। यह नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति अपने जीवनमें व्यक्तिस्वातन्त्र्यकी श्रद्धा तो करे पर उसकी प्राप्तिके लिए जीवनको परावलम्बी बनाये रखनेकी ओर उसका झकाव हो। यही कारण है कि अनन्तानुबन्धी चतुष्कको अनन्तका अनबन्धी माना गया है। इस प्रकार जीवनमें व्यक्तिस्वातन्य और तदनुरूप स्वावलम्बनके प्रति अभिरुचि हो जानेपर व्यक्ति पूर्ण स्वावलम्बी बननेके लिए उद्यत होता है । किन्तु अनादिकालीन परतन्त्रताओंका वह युगपत् त्याग नहीं कर सकता, इसलिए जैसी-जैसी अन्त:शुद्धि होती जाती है तदनुरूप वह स्वावलम्बी बनता जाता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्तिके जीवन में व्यक्तिस्वातन्त्र्य और उसके मार्ग स्वावलम्बनके प्रति पूर्ण श्रद्धाके होनेपर भी वह उसे जीवनमें उतारने में अपनेको असमर्थ पाता है। इसका कारण जहाँ जीवनकी भीतरी कमजोरी माना गया है वहाँ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ इस दशाके बनाये रखनेमें निमित्त हैं । यही कारण है कि इन कषायोंको आंशिक स्वावलम्बनका बाधक कहा है। और पूर्ण स्वावलम्बनमें बाधक कारण प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ माने गये हैं। संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ स्वावलम्बनके आचरणको सदोष तो करते हैं पर बाधक नहीं हो पाते। इस प्रकार मोहनीय और उसके अवान्तर भेदोंका क्या कार्य है इसका यहाँ संक्षेपमें विचार किया। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy