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________________ -8198751] अष्टमोऽध्यायः [301 8750. चारित्रमोहनीयं द्विधा; अकषायकवायभेदात् । ईषदर्थे नजः प्रयोगादीषत्कषापोऽकषाय इति । अकषायवेदनीयं नवविधम् । कुतः । हास्यादिभेदात् । यस्योदयाद्धास्याविर्भावस्तद्धास्यम् । यदुदया'देशादिष्वौत्सुक्यं सा रतिः । अरतिस्तद्विपरीता। यद्विपाकाच्छोचनं स शोकः । यदुदयादुद्वेगस्तद्भयम् । यदुदयादात्मदोष संवरणं 'परदोषाविष्करणं सा जुगुप्सा । यदुदयात्स्त्रैणाभावान्प्रतिपद्यते स स्त्रीवेदः । यस्योदयात्पौंस्नान्भावानास्कन्दति स पुवेदः । यदयान्नासकाभावानुपव्रजति स नपुसकवेदः । $751. कषायवेदनीयं षोडशविधम् । कुतः। अनन्तानुबन्ध्यादिविकल्पात् । तद्यथाकषायाः क्रोधमानमायालोभाः। तेषां चतस्रोऽवस्थाः --अनन्तानुबन्धिनोऽप्रत्याख्यानावरणाः प्रत्याख्यानावरणाः संज्वलनाश्चेति । अनन्तसंसारकारणत्वान्मिभ्यादर्शनमनन्तम । तदनुबन्धिनोऽनन्तानुबन्धिनः कोषमानमायालोभाः। यदुदयाद्दे विरति संयमासंयमाख्यामल्पामपि कतुं न शक्नोति ते देशप्रत्याख्यानमावृण्वन्तोऽप्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोभाः । यदुदयाद्विति कृत्स्नां संयमाख्यां न शक्नोति कतुं ते कृत्स्नं प्रत्याख्यानमावृण्वन्तः प्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोभाः । समेकीभावे वर्तते । संयमेन सहावस्थानादेकोभूय ज्वलन्ति संयमो वा ज्वलत्येषु सत्स्वपीति संज्वलनाः क्रोधमानमायालोभाः । त एते समुदिताः सन्तः षोडश कषाया भवन्ति । $ 750. चारित्रमोहनीय दो प्रकारका है.---अकषायवेदनीय और कषायवेदनीय । यहाँ ईषद् अर्थात् किंचित् अर्थ में 'न' का प्रयोग होनेसे किंचित् कषायको अकषाय कहा है। हास्य आदिके भेदसे अकषायवेदनोयके नौ भेद हैं । जिसके उदयसे हँसी आती है वह हास्य है । जिसके उदयसे देश आदिमें उत्सुकता होती है वह रति है । अरति इससे विपरीत है। जिसके उदयसे शोक होता है वह शोक है। जिसके उदयसे उद्वेग होता है वह भय है। जिसके उदयसे आत्मदोषोंका संवरण और परदोषोंका आविष्करण होता है वह जुगुप्सा है। जिसके उदयसे स्त्रीसम्बंधी भावोंको प्राप्त होता है वह स्त्रीवेद है। जिसके उदयसे पुरुषसम्बन्धी भावोंको प्राप्त होता है वह पुवेद है और जिसके उदयसे नपुसकसम्बन्धी भावोंको प्राप्त होता है वह नपु सकवेद है। 8751. अनन्तानबन्धी आदिके विकल्पसे कषायवेदनीयके सोलह भेद हैं। यथा--क्रोध, मान, माया और लोभ ये कषाय हैं। इनकी चार अवस्थाएँ हैं--अन्ततानुबन्धी,अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन। अनन्त संसारका कारण होनेसे मिथ्यादर्शन अनन्त कहलाता है तथा जो कषाय उसके अर्थात् अनन्तके अनुबन्धी हैं वे अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ हैं। जिनके उदयसे जिसका दूसरा नाम संयमासंयम है ऐसी देश विरतिको यह जीव स्वल्प भी करनेमें समर्थ नहीं होता है वे देशप्रत्याख्यानको आवृत करनेवाले अप्रत्याख्यानावरण, क्रोध, मान, माया और लोभ हैं। जिनके उदयसे संयम नामवाली परिपूर्ण विरतिको यह जीव करने में समर्थ नहीं होता है वे सकल प्रत्याख्यानको आवृत करनेवाले प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया और लोभ हैं। 'सं' एकीभाव अर्थमें रहता है । संयमके साथ अवस्थान होने में एक होकर जो ज्वलित होते हैं अर्थात् चमकते हैं या जिनके सद्भावमें संयम चमकता रहता है वे संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ हैं । ये सब मिलकर सोलह कषाय होते हैं। विशेषार्थ-मोहनीय कर्मके दो भेद हैं..दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय । जो समीचीन दर्शन अर्थात् तत्त्वरुचिके होने में बाधक कर्म है वह दर्शनमोहनीय है और जो समीचीन श्रद्धा के अनुकूल चारित्रके होनेमें बाधक कर्म है वह चारित्रमोहनीय है। दर्शनमोहनीयके मिथ्यात्व 1. -दयाद्विषयादि-- म., ता., ना.। 2. --अन्यदोषस्याधारणं दि. 1, दि. 2। अन्यदोषाविष्करणं सा-। 3. -दयास्त्रीणां भावा- आ., दि. 1, दि. 21 4. --देकीभूता ज्व-- आ, दि. 1, दि. 2, म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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