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________________ 300] सर्वार्थसिद्धौ. [819 8 747$ 747. चतुर्थ्याः प्रकृतेरुत्तरप्रकृतिविकल्पनिदर्शनार्थमाहदर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्न पुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलन विकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥9॥ 8748. दर्शनादयश्चत्वारः ज्यादयोऽपि । तत्र यथासंख्येन संबन्धो भवति-दर्शनमोहनीयं त्रिभेदम्, चारित्रमोहनीयं द्विभेदम्, अकषायवेदनीयं नवविधम्, कषायवेदनीयं षोडशविधमिति । 8749. तत्र दर्शनमोहनीयं त्रिभेदम्- सम्यक्वं मिथ्यात्वं तदुभयमिति । तद् बन्धं प्रत्येक भूत्वा सत्कर्मापेक्षया त्रिधा व्यवतिष्ठते । तत्र यस्योदयात्सर्वज्ञप्रणीतमार्गपराङ्मुखस्तत्त्वार्थश्रद्धाननिरुत्सुको हिताहितविचारासमर्थो मिथ्यादृष्टिर्भवति तन्मिथ्यात्वम् । तदेव सम्यक्त्वं शुभपरिणामनिरुद्धस्वरसं यदौदासीन्येनावस्थितमात्मनः श्रद्धानं न निरुणद्धि, तद्वेदयमानः पुरुषः सम्यग्दृष्टिरित्यभिधीयते। तदेव मिथ्यात्वं प्रक्षालनविशेषात्क्षीणाक्षीणमदशक्तिकोद्रववत्सामिशुद्धस्वरसं तदुभयमित्याख्यायते सम्यमिथ्यात्वमिति यावत् । यस्योदयादात्मनोऽर्धशुद्धमदकोद्रवौ दनोपयोगापादितमिश्रपरिणामवदुभयात्मको भवति परिणामः । 8747. अब चौथी मूल प्रकृतिके उत्तर प्रकृति विकल्प दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-- दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, अकषायवेदनीय और कषाय वेदनीय इनके क्रमसे तीन, दो, नौ और सोलह भेद हैं। सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और तदुभय ये तीन दर्शनमोहनीय हैं। अकषायवेदनीय और कषायवेदनीय ये दो चारित्र-मोहनीय हैं। हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुवेद और नपुसकवेद ये नौ अकषायवेदनीय हैं। तथा अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन ये प्रत्येक क्रोध, मान, माया और लोभके भेदसे सोलह कषायवेदनीय हैं ॥9॥ 8748. दर्शन आदिक चार हैं और तीन आदिक भी चार हैं । वहाँ इनका यथाक्रमसे सम्बन्ध होता है। यथा--दर्शनमोहनीय तीन प्रकारका है, चारित्रमोहनीय दो प्रकारका है, अकषायवेदनीय नौ प्रकारका है और कषायवेदनीय सोलह प्रकारका है। 8749. उनमें से दर्शनमोहनीयके तीन भेद ये हैं--सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और तदुभय। वह वन्धकी अपेक्षा एक होकर सत्कर्मकी अपेक्षा तीन प्रकारका है। इन तीनोंमें-से जिसके उदयसे यह जीव सर्वज्ञप्रणीत मार्गसे विमुख, तत्त्वार्थोके श्रद्धान करने में निरुत्सुक, हिताहितका विचार करनेमें असमर्थ ऐसा मिथ्यादृष्टि होता है वह मिथ्यात्व दर्शनमोहनीय है। वही मिथ्यात्व जब शभ परिणामोंके कारण अपने स्वरस (विपाक) को रोक देता है और उदासीनरूपसे अवस्थित रहकर आत्माके श्रद्धानको नहीं रोकता है तब सम्यक्त्व है। इसका वेदन करनेवाला पुरुष सम्यग्दष्टि कहा जाता है । वही मिथ्यात्व प्रक्षालन विशेषके कारण क्षीणाक्षीण मदशक्तिवाले कोदोंके समान अर्धशुद्ध स्वरसवाला होनेपर तदुभय कहा जाता है। इसीका दूसरा नाम सम्यग्मिथ्यात्व है । इसके उदयसे अर्धशुद्ध मदशक्तिवाले कोदों और ओदनके उपयोगसे प्राप्त हुए मिश्र परिणामके समान उभयात्मक परिणाम होता है। 1. --त्र्यादयोऽपि चत्वारः । तत्र मु., ता., ना.। 2. --कोद्रवोपयो-- म. । For Private & Personal Use Only . Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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