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________________ -816 § 742] अष्टमोऽध्यायः [297 8 739. आह, उक्तो मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविधः । इदानीमुत्तरप्रकृतिबन्धो वक्तव्य इत्यत आह पञ्चनवद्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥5॥ $ 740 द्वितीयग्रहणमिह कर्तव्यं द्वितीय उत्तरप्रकृतिबन्ध एवंविकल्प इति ? न कर्तव्यम् ; पारिशेष्यात्सिद्धेः । आद्यो मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविकल्प उक्तः । ततः पारिशेष्यादयमुत्तरप्रकृतिविकल्पविधिर्भवति । 'भेद'शब्दः पञ्चादिभिर्यथाक्रममभिसंबध्यते - पञ्चभेदं ज्ञानावरणीयं नवभेवं दर्शनावरणीयं द्विभेवं वेदनीयं अष्टाविंशतिभेदं मोहनीयं चतुर्भेदमायुः द्विचत्वारिंशद्भेदं नाम द्विभेवं गोत्रं पंचभेदोऽन्तराय इति । 8741. यदि ज्ञानावरणं पंचभेदं तत्प्रतिपत्तिरुच्यतामित्यत आह मतिश्रुतावधि मन:पर्ययकेवलानाम् ||6|| 8742. मत्यादीनि ज्ञानानि व्याख्यातानि । तेषामावृतेरावरणभेदो भवतीति पंचोत्तरप्रकृतयो वेदितव्याः । अत्र चोद्यते--अभव्यस्य मन:पर्ययज्ञानशक्तिः केवलज्ञानशक्तिश्च स्याद्वा न वा । यदि स्यात् तस्याभव्यत्वाभावः । अथ नास्ति तत्रावरणद्वयकल्पना व्यर्थेति ? उच्यतेआदेशवचनान्न दोषः । द्रव्यार्थादेशान्सनः पर्यय केवलज्ञानशक्ति संभवः । पर्यायार्थादेशात्तच्छक्त्यभावः । यद्येवं भव्यभव्यविकल्पो नोपपद्यते ; उभयत्र तच्छक्तिसद्भावात् ? न शक्तिभावाभावा 8.739. मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कहा । अब उत्तर प्रकृतिबन्धका कथन करते हैं-आठ मूल प्रकृतियोंके अनुक्रमसे पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, ब्यालीस, दो और पाँच भेद हैं ॥5॥ 8740. शंका - यहाँ द्वितीय पदका ग्रहण करना चाहिए, जिससे मालूम पड़े कि द्वितीय उत्तर प्रकृतिबन्ध इतने प्रकारका है ? समाधान नहीं करना चाहिए, क्योंकि पारिशेष्य न्यायसे उसकी सिद्धि हो जाती है। आदिका मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कह आये हैं, इसलिए पारिशेष्य न्याय से ये उत्तर प्रकृतिबन्धके भेद समझने चाहिए । भेद शब्द पाँच आदि शब्दोंके साथ यथाक्रमसे सम्बन्धको प्राप्त होता है । यथा- पाँच भेदनाला ज्ञानावरण, नौ भेदवाला दर्शनावरण, दो भेदवाला वेदनीय, अट्ठाईस भेदवाला मह, चार भेदवाला आयु, ब्यालीस भेदवाला नाम, दो भेदवाला गोत्र और पाँच भेदवाला अन्तरा । $ 741. यदि ज्ञानावरण कर्म पाँच प्रकारका है, तो उसका ज्ञान कराना है, अत: आगेका सूत्र कहते हैं मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान इनको आवरण करनेवाले कर्म पाँच ज्ञानावरण हैं ॥6॥ 742. मति आदि ज्ञानोंका व्याख्यान कर आये हैं। उनका आवरण करनेसे आवरणों में भेद होता है, इसलिए ज्ञानावरण कर्मकी पाँच उत्तर प्रकृतियाँ जानना चाहिए। शंका-अभव्य जीवके मन:पर्ययज्ञानशक्ति और केवलज्ञानशक्ति होती है या नहीं होती। यदि होती है तो उसके अभव्यपना नहीं बनता । यदि नहीं होती है तो उसके उक्त दो आवरण- कर्मोंकी कल्पना करना व्यर्थ है ? समाधान - आदेश वचन होनेसे कोई दोष नहीं है । अभव्य के द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है पर पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा उसके उसका 1. मूलः प्रकु - मु. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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