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________________ 298] सर्वार्थसिद्धौ [8178 743पेक्षयों भव्याभव्यविकल्प इत्युच्यते । कुतस्तहि ? व्यक्तिसद्भावासद्भावापेक्षया । सम्यग्दर्शनादिभिव्यक्तिर्यस्य भविष्यति स भव्यः । यस्य तु न भविष्यति सोऽभव्य इति । कनकेतरपाषाणवत् । 8743. आह, उक्तो ज्ञानावरणोत्तरप्रकृतिविकल्पः । इदानी दर्शनावरणस्य वक्तव्य इत्यत आहचक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धयश्च ॥7॥ 8744. चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानामिति दर्शनावरणापेक्षया भेदनिर्देशः-चक्षुर्वर्शनावरणमचक्षुर्दर्शनावरणमवधिदर्शनावरणं केवलदर्शनावरणमिति । मदखेदक्लमविनोदनार्थः स्वापो निद्रा। अभाव है । शंका -यदि ऐसा है तो भव्याभव्य विकल्प नहीं बन सकता है क्योंकि दोनोंके मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है ? समाधान --शक्तिके सदभाव और असदभावकी अपेक्षा भव्याभव्य विकल्प नहीं कहा गया है। शंका-तो किस आधारसे यह विकल्प कहा गया है ? समाधान व्यक्तिकी सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षा यह विकल्प कहा गया है। जिसके कनक पाषाण और इतर पाषाणकी तरह सम्यग्दर्शनादि रूपसे व्यक्ति होगी वह भव्य है और जिसके नहीं होगी वह अभव्य है। विशेषार्थ--यहाँ ज्ञानावरण कर्मके पाँच उत्तर-भेदोंका निर्देश किया गया है। मूलमें ज्ञान एक है। उसके ये पाँच भेद आवरणकी विशेषतासे प्राप्त होते हैं । धवला टीकामें इस विषयका स्पष्टीकरण करने के लिए सूर्य और मेघपटलका उदाहरण दिया गया है। वहाँ बतलाया है कि जिस प्रकार अति सघन मेघपटल सूर्यको आच्छादित करते हैं तो भी अतिमन्द सूर्य किरणें मेघपटलमेंसे प्रस्फुटित होती रहती हैं उसी प्रकार केवलज्ञानावरण कर्मके आवृत होनेपर भी कुछ न कुछ ज्ञानांश प्रस्फुटित होता रहता है और उसीको आवृत करनेसे चार उत्तर आवरण कर्म प्राप्त होते हैं । इस प्रकार कुल ज्ञानावरण कर्म पाँच हैं जो भव्य और अभव्य दोनोंके पाये जाते हैं। शास्त्रमें भव्य और अभव्य संज्ञा बन्ध विशेषकी अपेक्षा से दी गयी है। जीवके ये भेद इसी अपेक्षासे जानने चाहिए। इन भेदोंका अन्य कोई निमित्त नहीं है । बन्ध दो प्रकारका होता है—एक बन्ध वह जो सन्तानकी अपेक्षा अनादि अनन्त होता है और दसरा वह जो अनादि सान्त होता है। जिन जीवोंके कर्मका अनादि-अनन्त बन्ध होता है वे अभव्य कहलाते हैं और जिनके अनादिसान्त बन्ध होता है वे भव्य माने गये हैं। इसलिए शक्ति सब जीवोंके एक-सी होकर भी उसके व्यक्त होने में अन्तर हो जाता है। शास्त्रमें इस भेदको समझानेके लिए कनकपाषाण और अन्धापाषाण उदाहरणरूपसे उपस्थित किये गये हैं सो इस दृष्टान्तसे भी उक्त कथनकी ही पुष्टि होती है । इस प्रकार ज्ञानावर की ही पुष्टि होती है। इस प्रकार ज्ञानावरण कर्मके पाँच भेद क्यों हैं इस बातका खुलासा किया। 8743. ज्ञानावरण कर्मके उत्तर प्रकृतिविकल्प कहे। अब दर्शनावरण कर्मके कहने चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन इन चारोंके चार आवरण तथा निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचला-प्रचला और स्त्यानगृद्धि ये पाँच निद्रादिक ऐसे नौ दर्शनावरण हैं ॥7॥ 8744. चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवलका दर्शनावरणकी अपेक्षा भेदनिर्देश किया है; यथा-चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण । मद, खेद 1. --नादिर्व्यक्ति-- आ., दि. 1, दि. 2, ता. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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