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________________ 284] सर्वार्थसिद्धौ [71278713लेखनं कूटलेखक्रिया । हिरण्यादेव्यस्य निक्षेप्तुविस्मृतसंख्याल्पसंख्येयमाददानस्यैवमित्यनुज्ञावचनं न्यासापहारः । अर्थप्रकरणाङ्गविकारभ्र विक्षेपादिभिः पराकूतमुपलभ्य तदाविष्करणमसूयाविनिमित्तं यत्तत्साकारमन्त्रभेद इति कथ्यते । त एते सत्याणुव्रतस्य पंचातिचारा बोद्धव्याः। स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपक व्यवहाराः ॥27॥ 8713. मुष्णन्तं स्वयमेव वा प्रयुङ्क्तेऽन्येन वा प्रयोजयति प्रयुक्तमनुमन्यते वा यतः स स्तेनप्रयोगः । अप्रयुक्तेनानुमतेन च चौरेणानीतस्य ग्रहणं तदाहृतादानम् । उचितन्यायादन्येन प्रकारेण दानग्रहणमतिक्रमः । विरुद्धं राज्यं विरुद्धराज्यं विरुद्धराज्येऽतिक्रमः विरुद्धराज्यातिक्रमः । तत्र ह्यल्पमूल्यलभ्यानि महाया॑णि द्रव्याणीति प्रयत्नः । प्रस्थादि मानम्, तुलाद्युन्मानम् । एतेन न्यूनेनान्यस्मै देयमधिकेनात्मनो ग्राह्यमित्येवमादिकूटप्रयोगो होनाधिकमानोन्मानम् । कृत्रिमैहिरण्यादिभिर्वञ्चनापूर्वको व्यवहारः प्रतिरूपकव्यवहारः । त एते पञ्चादत्तादानाणुव्रतस्यातिचाराः। परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीडाकाम तीव्राभिनिवेशाः ॥28॥ 8714. कन्यादानं विवाहः । परस्य विवाहः परविवाहः। परविवाहस्य करणं परविवाहकुछ किया तो भी अन्य किसीकी प्रेरणासे उसने ऐसा कहा है और ऐसा किया है इस प्रकार छलसे लिखना कूटलेखक्रिया है । धरोहरमें चाँदी आदिको रखनेवाला कोई उसकी संख्या भूलकर यदि उसे कमती लेने लगा तो 'ठीक है' इस प्रकार स्वीकार करना न्यासापहार है। अर्थवश, प्रकरणवश, शरीरके विकारवश या भ्र क्षेप आदिके कारण दूसरेके अभिप्रायको जान कर डाहसे उसका प्रकट कर देना साकारमन्त्रभेद है। इस प्रकार ये सत्याणुव्रतके पाँच अतिचार जानने चाहिए। स्तनप्रयोग, स्तेन आहृतादान, विरुद्धराज्यातिक्रम, हीनाधिक मानोन्मान और प्रतिरूपकव्यवहार ये अचौर्य अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥27॥ 8713. किसीको चोरीके लिए स्वयं प्रेरित करना, या दूसरेके द्वारा प्रेरित कराना या प्रयुक्त हुए की अनुमोदना करना स्तेनप्रयोग है । अपने द्वारा अप्रयुक्त असम्मत चोरके द्वारा लायी हुई वस्तुका ले लेना तदाहृतादान है। यहाँ न्यायमार्गको छोड़ कर अन्य प्रकारसे वस्तु ली गयी है इसलिए अतिचार है । विरुद्ध जो राज्य वह विरुद्धराज्य है। राज्योंमें किसी प्रकारका विरोध होने पर मर्यादाका न पालना विरुद्धराज्यातिक्रम है । यदि वहाँ अल्प मूल्य में वस्तुएँ मिल गयीं तो उन्हें महंगा बेचनेका प्रयत्न करना विरुद्धराज्यातिकम है। मानपदसे प्रस्थ आदि मापने के बाट लिये जाते हैं और उन्मानपदसे तराजू आदि तौलनेके वाट लिये जाते हैं। कमती मापतौलसे दूसरेको देना और बढ़ती माप-तौलसे स्वयं लेना इत्यादि कुटिलतासे लेन-देन करना होनाधिकमानोन्मान है। बनावटी चाँदी आदिसे कपटपूर्वक व्यवहार करना प्रतिरूपक व्यवहार है,। इस प्रकार ये अदत्तादान अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं। परविवाहकरण, इत्वरिकापरिगृहीतागमन, इत्वारिका-अपरिगृहीतागमन, अनङ्गक्रीड़ा और कामतीव्राभिनिवेश ये स्वदारसन्तोष अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥28॥ 8714. कन्याका ग्रहण करना विवाह है। किसी अन्यका विवाह परविवाह है और 1. भ्रू निक्षेपणादि -मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org -
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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