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________________ [281 -7122 8705] सप्तमोऽध्यायः संबध्यते । ननु च विस्पष्टार्थ सेवितेत्येवं वक्तव्यम् ? न; अर्थविशेषोपपत्तेः । न केवलमिह से परिगृह्यते । कि तहि ? प्रीत्यर्थोऽपि । यस्मादसत्यां प्रीतौ बलान्न सल्लेखना कार्यते। सत्या हि प्रीतो स्वयमेव करोति । स्यान्मतमात्मवधः प्राप्नोति; स्वाभिसन्धिपूर्वकायुरादिनिवृत्तेः ? भष :: अप्रमत्तत्वात। 'प्रमत्तयोगात्प्राणध्यपरोपणं हिसा' इत्युक्तम । न चास्य प्रमादयोगीसि । कुतः । रागाद्यभावात् । रागद्वेषमोहाविष्टस्य हि विषशास्त्राधुपकरणप्रयोगवशादास्मानं मतः स्वघातो भवति । न सल्लेखनां प्रतिपन्नस्य रागादयः सन्ति ततो नात्मवलदोषः । उक्तं च-- "रागादीणमणुप्पा अहिंसगत्तं ति देिसिदं समये। तेसिं चे उप्पत्ती हिंसेति जिणेहि णिद्दिट्ठा ।" कि च मरणस्यानिष्टत्वाद्यथा वणिजो विविधपण्यदानादानसंचयपरस्य स्वगहविनाशोऽनिष्टः। तद्विनाशकारणे च कुतश्चिदुपस्थिते यथाशक्ति परिहरति । दुष्परिहारे च पण्यविनाशो यथा न. भवति तथा यतते । एवं गृहस्थोऽपि व्रतशीलपण्यसंचये प्रवर्तमानः तदाश्रयस्य न पातमभिवांछति। कषायोंका, उत्तरोत्तर काय और कषायको पुष्ट करनेवाले कारणोंको घटाते हुए, भले प्रकारसे लेखन करना अर्थात् कृष करना सल्लेखना है । मरणके अन्तमें होने वाली इस सल्लेखनाको प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला गृहस्थ होता है यह इस सूत्रका तात्पर्य है। शंका--सहज तरीकैसे अर्थका स्पष्टीकरण हो इसके लिए सूत्रमें 'जोषिता' इसके स्थानमें 'सेविता' कहना ठीक है। समाधान-नहीं; क्योंकि 'जोषिता' क्रियाके रखनेसे उससे अर्थ-विशेष ध्वनित हो जाता है। यहाँ केवल 'सेवन करना' अर्थ नहीं लिया गया है किन्तु प्रीति रूप अर्थ भी लिया गया है, क्योंकि प्रीतिके न रहने पर बलपूर्वक सल्लेखना नहीं करायी जाती । किन्तु प्रीतिके रहने पर जीव स्वयं हो सल्लेखना करता है। तात्पर्य यह है कि 'प्रीतिपूर्वक सेवन करना' यह अर्थ 'जोषिता' क्रियासे निकल आता है 'सेविता' से नहीं, अत: सूत्रमें 'जोषिता' क्रिया रखी है। शंका-चू कि सल्लेखनामें अपने अभिप्रायसे आयु आदिका त्याग किया जाता है, इसलिए यह आत्मघात हुआ ? समाधान--यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सल्लेखनामें प्रमादका अभाव । 'प्रमत्तयोगसे प्राणोंका वध करना हिंसा है' यह पहले कहा जा चुका है। परन्तु इसके प्रमाद नहीं है, क्योंकि इसके रागादिक नहीं पाये जाते। राग, द्वेष और मोहसे युक्त होकर जो विष और शस्त्र आदि उपकरणोंका प्रयोग करके उनसे अपना घात करता है उसे आत्मघातका दोष प्राप्त होता है। परन्तु सल्लेखनाको प्राप्त हुए जीवके रागादिक तो हैं नहीं, इसलिए इसे आत्मघातका दोष नहीं प्राप्त होता । कहा भी है. "शास्त्रमें यह उपदेश है कि रागादिका नहीं उत्पन्न होना अहिंसा है। तथा जिनदेवने उनकी उत्पत्तिको हिंसा कहा है ॥" . दूसरे, मरण किसी को भी इष्ट नहीं है। जैसे नाना प्रकारकी विक्रय वस्तुओंके देन, लेन और संचयमें लगे हुए किसी व्यापारीको अपने घरका नाश होना इष्ट नहीं है । फिर भी परिस्थितिवश उसके विनाशके कारण आ उपस्थित हों तो यथाशक्ति वह उनको दूर करता है । इतने पर भी यदि वे दूर न हो सकें तो जिससे विक्रय वस्तुओंका नाश न हो ऐसा प्रयत्न करता है उसी प्रकार पण्यस्थानीय व्रत और शीलके संचयमें जुटा हुआ गृहस्थ भी उनके आधारभूत आयु आदिका पतन नहीं चाहता । यदा कदाचित् उनके विनाशके कारण उत्पन्न हो जाय तो जिससे अपने गुणोमें बाधा नहीं पड़े इस प्रकार उनको दूर करनेका प्रयत्न करता है। इतने पर भी यदि वे दूर 1. ति भासिदं स- मु.। 2. -शक्ति च परि- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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