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________________ 2801 सर्वार्थसिद्धौ [7122 § 704 यानवाह 'नाभरणादिव्वेतावदे वेष्ट मतोऽन्यदनिष्टमित्यनिष्टान्निवर्तनं कर्तव्यं कालनियमेन यावज्जीवं वा यथाशक्ति । संयममविनाशयन्नततीत्यतिथिः । अथवा नास्य तिथिरस्तोत्यतिथिः अनियतकालागमन इत्यर्थः । अतिथये संविभागोऽतिथिसंविभागः । स चतुविधः; भिक्षोपकरणौषधप्रतिश्रयभेदात् । मोक्षार्थमभ्युद्यतायातिथये संयमपरायणाय शुद्धाय शुद्धचेतसा निरवद्या भिक्षा देया । धर्मोपकरणानि च सम्यग्दर्शनाद्युपबृंहणानि दातव्यानि । औषधमपि योग्यमुपयोजनीयम् । प्रतिश्रयश्च परमधर्मश्रद्धया प्रतिपादयितव्य इति । 'द' शब्दो वक्ष्यमाणगृहस्थधर्मसमुच्चयार्थः । $ 704. कः पुनरसौ मारणान्तिकों सल्लेखनां जोषिता ॥22॥ $ 705. स्वपरिणामोपात्तस्यायुष इन्द्रियाणां बलानां च कारणवशात्संक्षयो मरणम् । 'अन्त' ग्रहणं तद्भवमरणप्रतिपत्त्यर्थम् । मरणमन्तो मरणान्तः । स प्रयोजनमस्येति मारणान्तिकी । सम्यक्कायकषाय लेखना सल्लेखना । कायस्य बाह्यस्याभ्यन्तराणां च कषायाणां तत्कारणहापन• क्रमेण सम्यग्लेखना सहलेखना । तां मारणान्तिकों सल्लेखनां जोषिता सेविता गृहीत्यभि • यान और वाहन आदि परिभोग कहलाते हैं । इनका परिमाण करना उपभोग - परिभोग- परिमाण व्रत है । जिसका चित्त त्रसहिंसासे निवृत्त है उसे सदाके लिए मधु, मांस और मदिराका त्याग कर देना चाहिए । जो बहुत जन्तुओं की उत्पत्तिके आधार हैं और जिन्हें अनन्तकाय कहते हैं ऐसे केतकी के फूल और अर्जुनके फूल आदि तथा अदरख और मूली आदिका त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि इनके सेवन में फल कम और घात बहुत जीवोंका है। तथा यान, वाहन और आभरण आदि में हमारे लिए इतना ही इष्ट है शेष सब अनिष्ट है इस प्रकारका विचार करके कुछ कालके लिए या जीवन भर के लिए शक्त्यनुसार जो अपने लिए अनिष्ट हो उसका त्याग कर देना चाहिए । संयमका विनाश न हो इस विधिसे जो चलता है वह अतिथि है या जिसके आनेकी कोई तिथि नहीं उसे अतिथि कहते हैं । तात्पर्य यह है कि जिसके आनेका कोई काल निश्चित नहीं है उसे अतिथि कहते हैं । इस अतिथिके लिए विभाग करना अतिथिसंविभाग है । वह चार प्रकारका है - भिक्षा, उपकरण, औषध और प्रतिश्रय अर्थात् रहनेका स्थान । जो मोक्ष के लिए बद्धकक्ष है, संयम पालन करनेमें तत्पर है और शुद्ध है उस अतिथिके लिए शुद्ध मनसे निर्दोष भिक्षा देनी चाहिए । सम्यग्दर्शन आदिके बढ़ानेवाले धर्मोपकरण देने चाहिए। योग्य औषधकी करनी चाहिए तथा परम धर्म में श्रद्धापूर्वक निवास स्थान भी देना चाहिए । सूत्रमें जो 'च' शब्द है वह आगे कहे जानेवाले गृहस्थधर्म के संग्रह करनेके लिए दिया है । 8 704. वह और क्या होता है तथा वह मारणान्तिक संलेखनाका प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला होता है ||22|| 8705. अपने परिणामोंसे प्राप्त हुई आयुका, इन्द्रियोंका और मन, वचन, काय इन तीन बलोंका कारण विशेषके मिलने पर नाश होना मरण है । उसी भवके मरणका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें मरण शब्द के साथ अन्त पदको ग्रहण किया है। मरण यही अन्त मरणान्त है और जिसका यह मरणान्त ही प्रयोजन है वह मारणान्तिकी कहलाती है । अच्छे प्रकारसे काय और कष़ायका लेखन करना अर्थात् कृष करना सल्लेखना है । अर्थात् बाहरी शरीरका और भीतरी 1. 'यदनिष्टं तद्वृतयेद्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् ।' - रत्न 3,40 2. -- हापनया क्रमे - आ., fa. 1, at. I Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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