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________________ 278] सर्वार्थसिद्धौ - [71218 --703 $ 703. 'विरति'शब्दः प्रत्येक परिसमाप्यते । दिग्विरतिः देशविरतिः अनर्थदण्डविरतिरिति एतानि त्रीणि गुणवतानि; 'वत'शब्दस्य प्रत्येकमभिसंबन्धात् । तथा सामायिकवतं प्रोषधोपवासवतं उपभोगपरिभोगपरिमाणवतं अतिथिसंविभागवतं एतानि चत्वारि शिक्षा तानि । एतैव तैः संपन्नो गही विरताविरत इत्युच्यते । तद्यथा-दिक्प्राच्यादिः तत्र प्रसिद्धरभिज्ञानरवधिं कृत्वा नियमनं दिग्विरतिवतम् । ततो बहिस्त्रसस्थावरव्यपरोपणनिवृत्तेर्महा' व्रतत्वमवसे यम । तत्र लाभे सत्यपि परिणामस्य निवृत्तेर्लोभनिरासश्च कृतो भवति । ग्रामादीनामवधूतपरिमाणः प्रदेशो देशः । ततो बहिनिवृत्तिर्देशविरतिवृतम् । पूर्वबहिर्महावतत्वं यवस्थाप्यम् । असत्युपकारे पापादानहेतुरनर्थदण्डः । ततो विरतिरनर्थदण्डविरतिः । अनर्थदण्डः पंचविधः-अपध्यानं पापोपदेशः प्रमादाचरितं हिंसाप्रदानं अशुभश्रुतिरिति । तत्र परेषां जयपराजयवधबन्धनाङ्गच्छेदपरस्वहरणादि कथं स्यादिति मनसा चिन्तनमपध्यानम् ।' तिर्यक्क्लेशवाणिज्यप्राणिवधकारम्भादिषु पापसंयुक्तं वचनं पापोपदेशः। प्रयोजनमन्तरेण वृक्षाविच्छेदन भूमिकुट्टनसलिलसेचनाद्यवद्यकर्म प्रमादाचरितम् । विषकण्टकशस्त्राग्निरज्जुकशादण्डा 8703. विरति शब्द प्रत्येक शब्दपर लागू होता है । यथा-दिग्विरति, देशविरति और अनर्थदण्डविरति । ये तीन गुणवृत हैं, क्योंकि व्रत शब्दका हर एकके साथ सम्बन्ध है। तथा सामायिकवत, प्रोषधोपवासव्रत, उपभोगपरिभोगपरिमाणवत और अतिथिसंविभागवत ये चार है। इस प्रकार इन व्रतोंसे जो सम्पन्न हैं वह गृही विरताविरत कहा जाता है । खुलासा इस प्रकार है-जो पूर्वादि दिशाएँ हैं उनमें प्रसिद्ध चिह्नोंके द्वारा मर्यादा करके नियम करना दिग्विरतिव्रत है। उस मर्यादाके बाहर त्रस और स्थावर हिंसाका त्याग हो जानेसे उतने अंशमें महाव्रत होता है । मर्यादाके बाहर लाभ होते हुए भी उसमें परिणाम न रहनेके कारण लोभका त्याग हो जाता है। ग्रामादिककी निश्चित मर्यादारूप प्रदेश देश कहलाता है। उससे बाहर जाने का त्याग कर देना देशविरतिव्रत है। यहाँ भी पहलेके समान मर्यादाके बाहर महाव्रत होता है। उपकार न होकर जो प्रवृत्ति केवल पापका कारण है वह अनर्थदण्ड है। इससे विरत होना अनर्थदण्डविरतिवृत है। अनर्थदण्ड पाँच प्रकारका है-अपध्यान, पापोपदेश, प्रमादाचरित, हिंसाप्रदान और अशुभश्रुति । दूसरोंका जय, पराजय, मारना, बाँधना, अंगोंका छेदना और धनका अपहरण आदि कैसे होवे इस प्रकार मनसे विचार करना अपध्यान नामका अनर्थदण्ड है। तिर्यंचोंको क्लेश पहुँचानेवाले, वणिजका प्रसार करनेवाले और प्राणियोंकी हिंसाके कारणभूत आरम्भ आदिके विषय में पापबहुल वचन बोलना पापोपदेश नामका अनर्थदण्ड है। बिना प्रयोजनके वृक्षादिका छेदना, भूमिका कूटना, पानीका सींचना आदि पाप कार्य प्रमादाचरित नामका अनर्थदण्ड है। विष, काँटा, शस्त्र, अग्नि, रस्सी, चाबुक और लकड़ी आदि हिंसाके उपकरणोंका प्रदान करना हिंसाप्रदान नामका अनर्थदण्ड है । हिंसा और राग आदिको बढ़ानेवाली दुष्ट कथाओंका सूनना और उनकी शिक्षा देना अशुभश्रति नामका अनर्थदण्ड है। 'सम' उपसर्गका 1. वतम् । इत्येते--म.। 2. सीमन्तानां परतः स्थलेतरपंचपापसंत्यागात् । देशावकाशिकेन च महाबतानि प्रसाध्यन्ते ।।'-- रत्न. 3,5। 3. --माणप्रदेशो मु.। 4. 'पापोपदेशहिमादानापध्यानदुःथतीः पंच। प्राहः प्रमादचर्यामनर्थदण्डानदण्डधराः ॥'-- रत्न. 3, 51 5. -च्छेदस्वहर-- आ.। च्छेदसर्वस्वहर-- दि. 1, दि. 2। 6. 'वधबन्धच्छे दादे?षाद्रागाच्च परकलत्रादेः । आध्यानमपध्यानं शासति जिनशामने विशदाः ।।' --रत्न. 3,32। 7. --ध्यानम् । प्राणिवधक-- आ., दि. 1, दि. 2। 8. तिर्यकक्लेशवाणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् । कथाप्रसंगप्रसव: स्मर्तव्य: पाप उपदेशः ।।' --रत्न. 3,30। 9. 'क्षितिसलिलदहनपवनारम्मं विफलं वनस्पतिच्छेदम् । सरणं सारणमपि च प्रसादचर्यां प्रभाषन्ते ॥' --रत्न. 3,34 । www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only Jain Education International
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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