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________________ दिन 260] सर्वार्थसिद्धी [61238-653 $ 653. अथ शुभनामकर्मणः क आस्रव इत्यत्रोच्यते ___ तद्विपरीतं शुभस्य ॥23 8654. कायवाङ्मनसामृजुत्वमविसंवादनं च तद्विपरीतम् । 'च'शब्देन समुच्चितस्य च विपरीतं ग्राह्यम् । धार्मिकदर्शनसंभ्रमसद्भावोपनयनसंसरणभीरताप्रमाववर्जनादिः। तदेतच्छभनामकर्मास्रवकारणं वेदितव्यम्। 8655. आह किमेतावानेव शुभनाम्न आलवविधिरुत कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते-यदिदं तीर्थकरनामकर्मानन्तानुपमप्रभावमचिन्त्यविभूतिविशेषकारणं त्रैलोक्यविजयकरं तस्यास्रवविधिविशेषोऽस्तीति । यद्येवमुच्यतां के तस्यास्रवः । इत्यत इदमारभ्यते दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शीलवतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधियावृत्त्यकररणमहदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहारिणर्गिप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥24॥ $ 656.जिनेन भगवताहत्परमेष्ठिनोपदिष्ट निर्ग्रन्थलक्षणे मोक्षवमनि रुचिदर्शनविशुद्धिः प्रागुक्तलक्षणा । तस्या अष्टावङ्गानि निश्शङ्कितत्वं निःकाक्षिता विचिकित्साविरहता अमढदृष्टिता उपब्रहणं स्थितीकरणं वात्सल्यं प्रभावनं चेति । सम्यग्ज्ञानादिषु मोक्षमार्येषु तत्साधनेषु च स्वयोग्यवृत्त्या सत्कार आदरो विनयस्तेन संपन्नता विनयसंपन्नता। अहिंसाविषु व्रतेषु तत्प्रतिपाल $ 653. अब शुभ नामकर्मका आस्रव क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं। उससे विपरीत अर्थात् योगको सरलता और अविसंवाद ये शुभनामकर्मके आलव हैं॥23॥ 8654. काय, वचन और मनकी सरलता तथा अविसंवाद ये उससे विपरीत हैं। उसी प्रकार पूर्व सूत्रकी व्यवस्था करते हुए 'च' शब्दसे जिनका समुच्चय किया गया है उनके विपरीत आस्रवोंका ग्रहण करना चाहिए। जैसे-धार्मिक पुरुषों व स्थानोंका दर्शन करना, आदर सत्कार करना, सद्भाव रखना, उपनयन, संसारसे डरना और प्रमादका त्याग करना आदि । ये सब शुभ नामकर्मके आस्रवके कारण हैं। 8655. शंका-क्या इतनी ही शभ नामकर्मकी आस्रवविधि हैं या और भी कोई विशेषता है ? समाधान--जो यह अनन्त और अनुपम प्रभाववाला, अचिन्त्य विभूति विशेषका कारण और तीन लोककी विजय करनेवाला तीर्थंकर नामकर्म है उसके आस्रवमें विशेषता है, अतः अगले सूत्र द्वारा उसीका कथन करते हैं दर्शनविशुद्धि, विनयसंपन्नता, शील और व्रतोंका अतिचार रहित पालन करना, ज्ञानमें सतत उपयोग, सतत संवेग, शक्तिके अनुसार त्याग, शक्तिके अनुसार तप, साधु-समाधि, वैयावृत्त्य करना, अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभवित, आवश्यक कियाओंको न छोड़ना, मोक्षमार्गको प्रभावना और प्रवचनवात्सल्य ये तीर्थकर नामकर्मके आस्रव हैं ॥24॥ ६ 656. (1) जिन भगवान् अरिहंत परमेष्ठी द्वारा कहे हुए निर्ग्रन्थ स्वरूप मोक्षमार्ग- . पर रुचि रखना दर्शनविशुद्धि है । इसका विशेष लक्षण पहले कह आये हैं। उसके आठ अंग हैंनिःशंकितत्व, निःकांक्षिता, निविचिकित्सितत्व, अमूढदृष्टिता, उपबृहण, स्थितीकरण, वात्सल्य और प्रभावना । (2) सम्यग्जानादि मोक्षमार्ग और उनके साधन गुरु आदिके प्रति अपने योग्य 1. --मोक्षसाधनेषु तत्-- मु.। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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