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________________ -6125 §.657] षष्ठोऽध्यायः [261 नार्थेषु च क्रोधवर्जनादिषु शीलेषु निरवद्या वृत्तिः शीलव्रतेऽवनतीचारः । जीवादिपदार्थस्वतत्त्वविषये सम्यग्ज्ञाने नित्यं युक्तता अभीक्ष्णज्ञानोपयोगः । संसारदुःखान्नित्यभीरता संवेगः । त्यागो दानम् । तत्त्रिविधम्- आहारदानमभयदानं ज्ञानदानं चेति । तच्छक्तितो यथाविधि प्रयुज्यमानं त्याग इत्युच्यते । अनिगूहितवीर्यस्य मार्गाविरोधि कायक्लेशस्तपः । यथा भाण्डागारे दहने समुत्थिते तत्प्रशमनमनुष्ठीयते बहूपकारत्वात्तथाने कव्रतशील समृद्धस्य मुनेस्तपसः कुतश्चित्प्रत्यूहे समुपस्थिते तत्संधारणं समाधिः । गुणवद्दुःखोपनिपाते निरवद्येन विधिना तदपहरणं वैयावृत्त्यम् । अहंदाचार्येषु बहुश्रुतेषु प्रवचने च भावविशुद्धियुक्तोऽनुरागो भक्तिः । षण्णामावश्यकक्रियाणां यथाकालं प्रवर्तनमावश्यकपरिहाणिः । ज्ञानतपोदान जिन पूजा विधिना धर्मप्रकाशनं मार्गप्रभावना । वत्से धेनुवत्सघर्मणि स्नेहः प्रवचनवत्सलत्वम् । तान्येतानि षोडशकारणानि सम्यग्भाव्यमानानि व्यस्तानि च तीर्थंकर नामकर्मास्वकारणानि प्रत्येतव्यानि । 8657. इदानों नामास्त्रवाभिधानानन्तरं गोत्रात्रवे वक्तव्ये सति नोचैर्गोत्रस्यास्त्रवविधा - नार्थमिदमाह - परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्थ ||25| आचरणद्वारा आदर सत्कार करना विनय है और इससे युक्त होना विनयसम्पन्नता है । (3) अहिंसादिक व्रत हैं और इनके पालन करनेके लिए कोधादिकका त्याग करना शील है । इन दोनोंके पालन करनेमें निर्दोष प्रवृत्ति रखना शीलव्रतानतिचार है । ( 4 ) जीवादि पदार्थरूप स्वतत्त्वविषयक सम्यग्ज्ञानमें निरन्तर लगे रहना अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग है । (5) संसारके दुःखोंसे निरन्तर डरते रहना संवेग है । ( 6 ) त्यांग दान है। वह तीन प्रकारका है-आहारदान, अभयदान और ज्ञानदान । उसे शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक देना यथाशक्ति त्याग है । ( 7 ) शक्तिको न छिपाकर मोक्षमार्गके अनुकूल शरीरको क्लेश देना यथाशक्ति तप है । ( 8 ) जैसे भांडारमें आग लग जानेपर बहुत उपकारी होनेसे आगको शान्त किया जाता है उसी प्रकार अनेक प्रकारके व्रत और शीलोंसे समृद्ध मुनिके तप करते हुए किसी कारणसे विघ्नके उत्पन्न होनेपर उसका संधारण करना - शान्त करना साधुसमाधि है । (9) गुणी पुरुषके दुःख में आ पड़नेपर निर्दोष विधिसे उसका दुःख दूर करना वैयावृत्य है । (10-13 ) अरिहंत, आचार्य, बहुश्रुत और प्रवचन इनमें भावोंकी विशुद्धिके साथ अनुराग रखना अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति और प्रवचनभक्ति है। ( 14 ) छह आवश्यक क्रियाओंका यथा समय करना आवश्यकापरिहाणि है । (15) ज्ञान, तप, दान और जिनपूजा इनके द्वारा धर्मका प्रकाश करना मार्गप्रभावना है । ( 16 ) जैसे गाय बछड़ेपर स्नेह रखती है उसी प्रकार साधर्मियोंपर स्नेह रखना प्रवचनवत्सलत्व है । ये सब सोलह कारण हैं। यदि अलग-अलग इनका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थंकर नामकर्मके आसवके कारण होते हैं और समुदायरूपसे सबका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थकर नामकर्मके आस्रवके कारण जानने चाहिए । § 657. नामकर्मके आसूवोंका कथन करनेके बाद अब गोत्रकर्मके आस्रवोंका कथन क्रमप्राप्त है । उसमें भी पहले नीच गोत्रके आसूवोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, सद्गुणों का उच्छादन और असद्गुणों का उद्भावन ये नीचगोत्रके आलव हैं || 2500 1. -चार्यबहु- मु. 2. तपोजिन - मु. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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