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________________ 259 -6122 8652] षष्ठोऽध्यायः 8649. किमेतावानेव देवस्यायुष आस्रवः । नेत्याह सम्यक्त्वं च ॥21॥ 8650. किम् ? वैवस्यायुष आस्रव इत्यनुवर्तते। अविशेषाभिधानेऽपि सौधर्मादिविशेषगतिः। कुतः। पृथक्करणात् । यद्येवम्, पूर्वसूत्रे, उक्त आस्रवविधिरविशेषेण प्रसक्तः तेन सरागसंयमसंयमासंयमावपि भवनवास्याद्यायुष आस्रवौ प्राप्नुतः । नैष दोषः; सम्यक्त्वाभावे सति तद्वचपदेशाभावात्तदुभयमप्यत्रान्तर्भवति। 8651. आयुषोऽनन्तरमुद्दिष्टस्य नाम्न आस्रवविधौ वक्तव्ये, तत्राशुभनाम्न आस्रवप्रतिपत्त्यर्थमाह योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥22॥ 8652. योगस्त्रिप्रकारो व्याख्यातः। तस्य वक्रता कौटिल्यम् । विसंवादनमन्यथाप्रवर्तनम् । ननु च नार्थभेवः, योगवऋतैवान्यथाप्रवर्तनम् ? सत्यमेवमेतत्-स्वगता योगवतेत्युच्यते । परगतं विसंवादनम् । सम्यगम्युदयनिःश्रेयसार्थासु क्रियासु प्रवर्तमानमन्यं तद्विपरीतकायवाङ्मनोभिविसंवावयति मैवं कार्पोरेवं कुर्वोति । एतदुभयमशुभनामकर्मासवकारणं वेदितव्यम् । 'च'शम्वेन मिथ्यादर्शनपैशुन्यास्थिरचित्तताकूटमानतुलाकरणपरनिन्दात्मप्रशंसादिः समुच्चीयते। 86 49. क्या देवायुका आस्रव इतना ही है या और भी है ? अब इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं सम्यक्त्व भी देवायुका आस्रव है ॥21॥ 8650. शंका-किस कारणसे । समाधान-अलग सूत्र बनानेसे । शंका-यदि ऐसा है तो पूर्व सूत्रमें जो विधान किया है वह सामान्यरूपसे प्राप्त होता है और इससे सरागसंयम और संयमासंयम ये भवनवासी आदिकी आयुके भी आस्रव हैं यह प्राप्त होता है ? समाधान यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि सम्यक्त्वके अभावमें सरागसंयम और संयमासंयम नहीं होते, इसलिए उन दोनोंका यहीं अन्तर्भाव होता है । अर्थात् ये भी सौधर्मादि देवायुके आस्रव हैं; क्योंकि ये सम्यक्त्वके होनेपर ही होते हैं। 8651. आयुके बाद नामके आस्रवका कथन क्रमप्राप्त है। उसमें भी पहले अशुभ नामके आस्रवका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं। योगवक्रता और विसंवाद ये अशुभ नाम कर्मके आस्रव हैं ॥22॥ 6652. तीन प्रकारके योगका व्याख्यान पहले कर आये हैं। इसकी कुटिलता योगवता है। अन्यथा प्रवृत्ति करना विसंवाद है । शंका-इस तरह इनमें अर्थभेद नहीं प्राप्त होता; क्योंकि योगवत्रता और अन्यथा प्रवृत्ति करना एक ही बात है ? समाधान—यह कहना सही है तब भी स्वगत योगवक्रता कही जाती है और परगत विसंवादन । जो स्वर्ग और मोक्षके योग्य समीचीन क्रियाओंका आचरण कर रहा है उसे उसके विपरीत मन, वचन और कायकी प्रवृत्तिद्वारा रोकना कि ऐसा मत करो ऐसा करो विसंवादन है। इस प्रकार ये दोनों एक नहीं हैं किन्तु अलग-अलग हैं। ये दोनों अशुभ नामकर्मके आस्रवके कारण जानने चाहिए। सूत्रमें आये हुए 'च' पदसे मिथ्यादर्शन, चुगलखोरी, चित्तका स्थिर न रहना, मापने और तौलनेके बाँट घट-बढ़ रखना, दूसरोंकी निन्दा करना और अपनी प्रशंसा करना आदि आस्रवोंका समुच्चय होता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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