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________________ -6114 § 636] षष्ठोऽध्यायः [255 'भूत' ग्रहणात् सिद्धे 'व्रत' ग्रहणं तद्विषयानुकम्पाप्राधान्यख्यापनार्थम् । त एते सद्वेयस्यास्रवा ज्ञेयाः । 8633. अथ तदनन्तरोद्देशभाजो मोहस्यास्रवहेतौ वक्तव्ये तद्भेदस्य दर्शनमोहस्यास्त्रवहेतुप्रतिपादनार्थमिदमुच्यते केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादी दर्शन मोहस्य 111311 $ 634. निरावरणज्ञानाः केवलिनः । तदुपदिष्टं बुद्ध्यतिशयद्धयुक्तगणधरानुस्मृतं ग्रन्थरचनं श्रुतं भवति । रत्नत्रयोपेतः श्रमणगणः संघः । अहिंसालक्षणस्तदागमदेशितो धर्मः । देवाश्चतुणिकाया उक्ताः । गुणवत्सु महत्सु असद्भूतदोषोद्भावनमवर्णवादः । एतेष्ववर्णवादो दर्शन मोहस्यास्रवहेतुः । कवलाभ्यवहारजीविनः केवलिन इत्येवमादि वचनं केवलिनामवर्णवादः । मांसभक्षणाद्यनवद्याभिधानं । श्रुतावर्णवादः । शूद्रत्वाशुचित्वाद्याविर्भावनं संघावर्णवाद: । जिनोपदिष्टो धर्मो निर्गुणस्तदुपसेविनो ये ते चासुरा भविष्यन्तीत्येवमाद्य भिधानं धर्मावर्णवादः । रामांसोपसेवाद्याघोषणं देवावर्णवादः । $ 635. द्वितीयस्य मोहस्यास्त्रवभेदप्रतिपादनार्थमाह कषायोदयात्तीव्रपरिणामचारित्रमोहस्य ||14| § 636. कषाया उक्ताः । उदयो विपाकः । कषायाणामुदयात्तीत्र परिणामश्चारित्रमोहस्या करना वे प्रकार हैं । यद्यपि भूतपदके ग्रहण करनेसे व्रतियोंका ग्रहण हो जाता है तो भी व्रती - विषयक अनुकम्पाकी प्रधानता दिखलाने के लिए सूत्रमें 'व्रती' पदको अलग से ग्रहण किया है। ये सब सातावेदनीयके आस्रव जानने चाहिए । 8633. अब इसके बाद मोहनीयके आस्रवके कारणोंका कथन करना क्रमप्राप्त है । उसमें भी पहले उसके प्रथम भेद दर्शन मोहनीयके आस्रवके कारणोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देव इनका अवर्णवाद दर्शनमोहनीय कर्मका आस्रव है ॥13 8634. जिनका ज्ञान आवरण रहित है वे केवली कहलाते हैं | अतिशय बुद्धिवाले गणधरदेव उनके उपदेशोंका स्मरण करके जो ग्रन्थोंकी रचना करते हैं वह श्रुत कहलाता है। रत्नत्रयसे 'युक्त श्रमणोंका समुदाय 'संघ कहलाता है। सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित आगम में उपदिष्ट अहिंसा ही धर्म है । चार निकायवाले देवोंका कथन पहले कर आये हैं । गुणवाले बड़े पुरुषोंमें जो दोष नहीं है उनका उनमें उद्भावन करना अवर्णवाद है । इन केवली आदिके विषय में किया गया अवर्णवाद दर्शनमोहनीयके आस्रवका कारण है । यथा केवली कवलाहारसे जीते हैं इत्यादि रूपसे कथन करना के वलियोंका अवर्णवाद है । शास्त्रमें मांसभक्षण आदिको निर्दोष कहा है इत्यादि रूपसे कथन करना श्रुतका अवर्णवाद है । ये शूद्र हैं, अशुचि हैं, इत्यादि रूपसे अपवाद करना संघका अवर्णवाद है । जिनदेव के द्वारा उपदिष्ट धर्म में कोई सार नहीं, जो इसका सेवन करते हैं वे असुर होंगे इस प्रकार कथन करना धर्मका अवर्णवाद है । देव सुरा और मांस आदिका सेवन करते हैं इस प्रकारका कथन करना देवोंका अवर्णवाद है । 8635. अब मोहनीयका दूसरा भेद जो चारित्र मोहनीय है उसके आस्रवके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं कषायके उदयसे होनेवाला तीव्र आत्मपरिणाम चारित्रमोहनीयका आस्रव है ॥14॥ § 636. कषायोंका व्याख्यान पहले कर आये हैं । विपाकको उदय कहते हैं । कषायों के 1. - णाद्यभिधानं ना । 2. -त्येवमभि- म्. । Jain Education International मु. For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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