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________________ -51408604] पंचमोऽध्यायः [241 8603. वर्तनालक्षणस्य मुख्यस्य कालस्य प्रमाणमुक्तम् । परिणामादिगम्यस्य व्यवहारकालस्य किं प्रमाणमित्यत इदमुच्यते सोऽनन्तसमयः ॥4॥ 8604. साम्प्रतिकस्यैकसमयिकत्वेऽपि अतीता अनागताश्च समया अनन्ता इति कृत्वा 'अनन्तसमयः' इत्युच्यते । अथवा मुख्यस्यैव कालस्य प्रमाणावधारणार्थमिदमुच्यते। अनन्तपर्यायऔर पुद्गल बन्धकी अपेक्षा अनेक प्रदेशरूप शक्तिसे युक्त होनेके कारण इनका प्रदेशप्रचय बन जाता है, किन्तु कालद्रव्य शक्ति और व्यक्ति दोनों रूपसे एक प्रदेशरूप होनेके कारण उसमें पदेशप्रचय नहीं बनता । ऊर्ध्वप्रचय सब द्रव्योंका होता है, किन्तु इतनी विशेषता है कि अन्य पाँच द्रव्योंमें समयनिमित्तक पर्यायप्रचयरूप ऊर्ध्वप्रचय होता है और कालद्रव्यमें मात्र समयप्रचय रूप ऊर्ध्वप्रचय होता है, क्योंकि अन्य द्रव्योंके परिणमनमें काल द्रव्य निमित्त है और काल द्रव्यके अपने परिणमनमें अन्य कोई निमित्त नहीं है। वही उपादान है। जिस प्रकार वह अन्य द्रव्योंके परिणमनमें निमित्त होता है उसी प्रकार अपने परिणमनमें भी निमित्त होता है । जिस प्रकार अन्य द्रव्य अपने-अपने उपादानके अनुसार परिणमन करते हैं उसी प्रकार काल द्रव्य भी अपने उपादान के अनुसार परिणमन करता है। इस प्रकार यद्यपि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यरूपसे तथा गुण और पर्यायरूपसे काल द्रव्यके अस्तित्वकी सिद्धि हो जाती है पर वह अखण्ड एकप्रदेशी है यह सिद्ध नहीं होता, इसलिए आगे इसी बातका विचार करते हैं एक पुद्गल परमाणु मन्दगतिसे एक आकाश प्रदेशसे दूसरे आकाश प्रदेश पर जाता है और इसमें कुछ समय भी लगता है। यदि विचार कर देखा जाय तो ज्ञात होगा कि यह समय ही काल द्रव्यकी पर्याय है जो कि अतिसूक्ष्म होनेसे निरंश है । यदि कालद्रव्यको लोकाकाशके बराबर अखण्ड और एक माना जाता है तो इस अखण्ड समय पर्यायकी निष्पत्ति नहीं होती, क्योंकि पुद्गल परमाणु जब एक कालाणको छोड़कर दूसरे कालाणुके प्रति गमन करता है तब वहाँ दोनों कालाणु पृथक्-पृथक् होनेसे समयका भेद बन जाता है। और यदि एक अखण्ड लोकके बराबर कालद्रव्य होवे तो समय पर्यायकी सिद्धि किस तरह हो सकती है ? यदि कहा जाय कि कालद्रव्य लोकप्रमाण असंख्यात प्रदेशी है, उसके एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशके प्रति जानेपर समय पर्यायको सिद्धि हो जायगी तो इसका समाधान यह है कि ऐसा मानने पर एक अखण्डद्रव्यके एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशपर जाने पर समय पर्यायका भेद नहीं बनता। इसलिए समय पर्यायमें भेद सिद्ध करनेके लिए काल द्रव्यको अणरूपमें स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार काल द्रव्य क्या है और वह एक प्रदेशी कैसे है इस बातका विचार किया। 8603. वर्तना लक्षणवाले मुख्य कालका प्रमाण कहा । परन्तु परिणाम आदिके द्वारा जानने योग्य व्यवहार कालका क्या प्रमाण है ? इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं वह अनन्त समयवाला है।40॥ 8604. यद्यपि वर्तमान काल एक समयवाला है तो भी अतीत और अनागत अनन्त समय हैं ऐसा मानकर कालको अनन्त समयवाला कहा है । अथवा मुख्य कालका निश्चय करनेके लिए यह सूत्र कहा है । तात्पर्य यह है कि अनन्त पर्यायें वर्तना गुणके निमित्तसे होती हैं, इस Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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