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________________ 242] सर्वार्थसिद्धौ [5141 8605वर्तनाहेतुत्वादेकोऽपि कालाणुरनन्त इत्युपचर्यते । समयः पुनः परमनिरुद्धः कालांशस्तत्प्रचविशेष आवलिकादिरवगन्तव्यः। 8605. आह गुणपर्ययवद् द्रव्यमित्युक्तं तत्र के गुणा इत्यत्रोच्यते __ द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥1॥ $606. द्रव्यमाश्रयो येषां ते द्रव्याश्रयाः । निष्क्रान्ता गुणेभ्यो निर्गुणाः। एवमुभयलक्षणोपेता गुणा इति । 'निर्गुणाः' इति विशेषणं द्वचणुकादिनिवृत्त्यर्थम् । तान्यपि हि कारणभूतपरमाणुद्रव्याश्रयाणि गुणवन्ति तु तस्मात् 'निर्गुणाः' इति विशेषणात्तानि नित्तितानि भवन्ति। ननु पर्याया अपि घटसंस्थानादयो द्रव्याश्रया निर्गुणाश्च, तेषामपि गुणत्वं प्राप्नोति । 'द्रव्याश्रयाः' इति वचनात् 'नित्यं द्रव्यमाश्रित्य वर्तन्ते ये' ते गुणा इति विशेषात्पर्याया निवतिता भवन्ति। ते हि कादाचित्का इति। लिए एक कालाणुको भी उपचारसे अनन्त कहा है। परन्तु समय अत्यन्त सूक्ष्म कालांश है और उसके समुदायकी आवलि आदि जानना चाहिए। विशेषार्थ-समय शब्द द्रव्य और पर्याय दोनों अर्थों में व्यवहृत होता है । यहाँ पर्यायरूप अर्थ लिया गया है। इससे व्यवहार काल और निश्चय काल दोनों की सिद्धि होती है। एक-एक समयका समुच्चय होकर जो आवलि, पल आदि कालका व्यवहार होता है वह व्यवहारकाल है और यह समय-पर्याय बिना पर्यायीके नहीं हो सकती, इससे निश्चय कालका ज्ञान होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। 8605. 'गुण और पर्यायवाला द्रव्य है' यह पहले कह आये हैं । अब गुण क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं जो निरन्तर द्रव्यमें रहते हैं और गुणरहित हैं वे गुण हैं ॥41॥ 8606. जिनके रहनेका आश्रय द्रव्य है वे द्रव्याश्रय कहलाते हैं और जो गुणोंसे रहित हैं वे निर्गुण कहे जाते हैं। इस प्रकार इन दोनों लक्षणोंसे युक्त गुण होते हैं। सूत्रमें 'निर्गुणाः' यह विशेषण व्यणुक आदिके निराकरण करनेके लिए दिया है । वे भी अपने कारणभूत परमाणु द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं और गुणवाले हैं, इसलिए 'निर्गुणाः' इस विशेषणसे उनका निषेध किया गया है । शंका-घटसंस्थान आदि जितनी पर्याय हैं वे सब द्रव्यके आश्रयसे रहती हैं और निर्गुण होती हैं अतः गुणके उक्त लक्षणके अनुसार उन्हें भी गुणत्व प्राप्त होता है ? समाधानसूत्र में जो 'द्रव्याश्रयाः' विशेषण है उसका यह अभिप्राय है कि जो सदा द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं वे गुण हैं । इस प्रकार ‘सदा' विशेषण लगानेसे पर्यायोंका निषेध हो जाता है अर्थात् गुणका लक्षण पर्यायोंमें नहीं जाता है; क्योंकि पर्याय कादाचित्क होती हैं। विशेषार्थ---पहले गुण और पर्यायवाला द्रव्य है यह कह आये हैं । यहाँ गुणके स्वरूपका विचार किया गया है। जब कि द्रव्यको गुण और पर्यायवाला बतलाया है तब इसीसे स्पष्ट है कि गुण द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं अर्थात द्रव्य आधार है और गण आधेय है। पर इससे आधार और आधेयमें दही और कुण्डके समान सर्वथा भेदपक्षका ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि गुण द्रव्यके आश्रयसे रहते हुए भी वे उससे कथंचित् अभिन्न हैं । जैसे-तैल तिलके सब अवयवोंमें व्याप्त होकर रहता है वैसे ही प्रत्येक गुण द्रव्यके सभी अवयवोंमें समान रूपसे व्याप्त होकर रहता है, पर इससे व्यणुक आदिमें भी यह लक्षण घटित हो जाता है क्योंकि द्वयणुक आदि भी 1. -निकृष्ट; कालां- दि. 1। 2. -र्तन्ते गुणा मु.। 3. विशेषणत्वात्पर्यायश्च निव. मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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