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________________ --5123 8570] पंचमोऽध्यायः [223 गुणवृद्धिहानिकृतः । क्रिया परिस्पन्दात्मिका । सा द्विविधा; प्रायोगिकवैस्रसिकभेदात् । तत्र प्रायोगिकी शकटादीनाम्, वैस्खसिको मेघादीनाम् । परत्वापरत्वे क्षेत्रकृते कालकृते च स्तः । तत्र 'कालोपकारप्रकरणात्कालकृते गृह्यते । त एते तनादय उपकाराः कालस्यास्तित्वं गमयन्ति । ननु 'वर्तना' ग्रहणमेवास्तु, तद्भदाः परिणामादयस्तेषां पृथग्ग्रहणमनर्थकम् ? नानर्थकम् ; कालद्वयसूचनार्थत्वात्प्रपञ्चस्य । कालो हि द्विविधः परमार्थकालो व्यवहारकालश्च । परमार्थकालो वर्तनालक्षणः । परिणामादिलक्षणो व्यवहारकालः। अन्येन परिच्छिन्नः अन्यस्य परिच्छेदहेतुः क्रियाविशेषः काल इति व्यवह्रियते । स त्रिधा व्यवतिष्ठते-भूतो वर्तमानो भविष्यन्निति । तत्र परमार्थकाले कालव्यपदेशो मुख्यः। भूतादिव्यपदेशो गौणः । व्यवहारकाले भूतादिव्यपदेशो मुख्यः। कालव्यपदेशो गौणः; क्रियावद्व्यापेक्षत्वात्कालकृतत्वाच्च । अत्राह, धर्माधर्माकाशपुद्गलजीवकालानामुपकारा उक्ताः । लक्षणं चोक्तम् 'उपयोगो लक्षणम् इत्येवमादि। पुद्गलानां नु सामान्यलक्षणभुक्तम् 'अजीवकायाः' इति । विशेषलक्षणं नोक्तम् । तत्किमित्यत्रोच्यते स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥23॥ 8570. स्पृश्यते स्पर्शनमात्रं वा स्पर्शः। सोऽष्टविधः; मृदुकठिनगुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षभेदात् । रस्यते रसनमात्रं वा रसः। स पञ्चविधः; तिक्ताम्लकटुकमधुरकषायभेदात् । प्रतिच्छेदों) की वृद्धि और हानिसे उत्पन्न होता है । द्रव्यमें जो परिस्पन्दरूप परिणमन होता है उसे क्रिया कहते हैं । प्रायोगिक और वैस्रसिकके भेदसे वह दो प्रकारकी है। उनमें से गाड़ी आदि की प्रायोगिक क्रिया है और मेधादिकको वैससिकी। परत्व और अपरत्व दो प्रकारका है-- क्षेत्रकृत और कालकृत । प्रकृतमें कालकृत उपकारका प्रकरण है, इसलिए कालकृत परत्व और अपरत्व लिये गये हैं। ये सब वर्तनादिक उपकार कालके अस्तित्वका ज्ञान कराते हैं। शंका-- सूत्रमें केवल वर्तना पदका ग्रहण करना पर्याप्त है। परिणाम आदिक उसके भेद हैं, अतः उनका अलंगसे ग्रहण करना निष्फल है । समाधान-परिणाम आदिकका अलगसे ग्रहण करना निष्फल नहीं है, क्योंकि दो प्रकारके कालके सूचन करनेके लिए इतना विस्तारसे कथन किया है। काल दो प्रकारका है...परमार्थ काल और व्यवहारकाल । इनमें-से परमार्थ काल वर्तना लक्षणवाला है और परिणाम आदि लक्षणवाला व्यवहार काल है। तात्पर्य यह है कि जो क्रिया विशेष अन्यसे परिच्छिन्न होकर अन्यके परिच्छेिदका हेतु है उसमें काल इस प्रकारका व्यवहार किया गया है। वह काल तीन प्रकारका है-भूत, वर्तमान और भविष्यत् । उनमें से परमार्थ कालमें काल यह संज्ञा मुख्य है और भतादिक व्यपदेश गौण है। तथा व्यवहार काल में भतादिकरूप संज्ञा मुख्य है और काल संज्ञा गौण है, क्योंकि इस प्रकारका व्यवहार क्रिया वाले द्रव्यकी अपेक्षासे होता है तथा कालका कार्य है । यहाँ पर शंकाकार कहता है कि धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल, जीव और काल द्रव्यका उपकार कहा तथा, 'उपयोगो लक्षणम्' इत्यादि सूत्र द्वारा इनका लक्षण भी कहा । इसी प्रकार 'अजीवकाया' इत्यादि सूत्र द्वारा पुद्गलोंका सामान्य लक्षण भी कहा, किन्तु पुद्गलोंका विशेष लक्षण नहीं कहा, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं--- स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णवाले पुद्गल होते हैं ॥23॥ 8570. जो स्पर्श किया जाता है उसे या स्पर्शनमात्रको स्पर्श कहते हैं । कोमल, कठोर, भारी, हल्का, ठंडा, गरम, स्निग्ध और रूक्षके भेदसे वह आठ प्रकारका है। जो स्वाद रूप होता 1. -त्मिका । परत्वापरत्वे ता.। 2. कालोपकरणा- मु.। 3. -मुवतं विशेष- आ., दि. 1, दि. 2। . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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