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________________ -3112 8388] तृतीयोऽध्यायः [159 रिणो दक्षिणात्पूर्वापरसमुद्रयोमध्ये संनिवेशी हैरण्यक्तवर्षः । शिखरिण उत्तरतस्त्रयाणां समुद्राणां मध्ये ऐरावतवर्षः । विजयार्द्धन रक्तारक्तोदाभ्यां च विभक्तः स षट्खण्डः। 8386. षट् कुलपर्वता इत्युक्तं के पुनस्ते कथं वा व्यवस्थिता इत्यत आहतद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ॥1॥ 8387. तानि क्षेत्राणि विभजन्त इत्येवंशीलास्तद्विभाजिनः । पूर्वापरायता इति पूर्वापरकोटिभ्यां लवणजलधिस्पशिन इत्यर्थः। हिमवदादयोऽनादिकालप्रवत्ता अनिमित्तसंज्ञा वर्षविभागहेतुत्वाद्वर्षधरपर्वता इत्युच्यन्ते । तत्र क्व हिमवान् ? भरतस्य हैमवतस्य च सोमनि व्यवस्थितः । क्षुद्रहिमवान् योजनशतोच्छ्रायः । हैमवतस्य हरिवर्षस्य च विभागकरो महाहिमवान् द्वियोजनशतोच्छायः । विदेहस्य दक्षिणतो हरिवर्षस्योत्तरतो निषधो नाम पर्वतश्चतुर्योजनशतोच्छायः । उत्तरे त्रयोऽपि पर्वताः स्ववर्षविभाजिनो व्याख्याताः । उच्छायश्च तेषां चत्वारि द्वे एकं च योजनशतं वेदितव्यम् । सर्वेषां पर्वतानामुच्छायस्य चतुर्भागोऽवगाहः । 8 388. तेषां वर्णविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह हेमाजुनतपनीयौडूर्यरजतहेममयाः ॥12।। पश्चिम समुद्रके बीच में रम्यक क्षेत्र है। रुक्मीके उत्तरमें और शिखरीके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीच में हैरण्यवत क्षेत्र है । शिखरीके उत्तरमें और तीन समुद्रोंके बीच में ऐरावत क्षेत्र है जो विजयाधं और रक्ता रक्तोदासे विभाजित होकर छन् खण्डोंमें बँटा हुआ है। 386. कुलपर्वत छह हैं यह पहले कह आये हैं, परन्तु वे कौन हैं और कहाँ स्थित हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं उन क्षेत्रोंको विभाजित करनेवाले और पूर्व-पश्चिम लम्बे ऐसे हिमवान, महाहिमवान्, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी ये छह वर्षधर पर्वत हैं ॥1॥ 387. इन पर्वतोंका स्वभाव उन क्षेत्रोंका विभाग करना है, इसलिए इन्हें उनका विभाग करनेवाला कहा है । ये पूर्वसे पश्चिम तक लम्बे हैं । इसका यह भाव है कि इन्होंने अपने पूर्व और पश्चिम सिरेसे लवण समुद्रको स्पर्श किया है। ये हिमवान् आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ रही हैं और बिना निमित्तकी हैं । इन पर्वतोंके कारण क्षेत्रोंका विभाग होता है इसलिए इन्हें वर्षधर पर्वत कहते हैं । हिमवान् पर्वत कहाँ है अब इसे बतलाते हैं-भरत और हैमबत क्षेत्रकी सीमापर हिमवान् पर्वत स्थित है। इसे क्षुद्र हिमवान् भी कहते हैं। यह सो योजन ऊँचा है। हैमवत और हरिवर्षका विभाग करनेवाला महाहिमवान है। यह दो सौ योजन ऊँचा है। विदेहके दक्षिणमें और हरिवर्षके उत्तर में निषध पर्वत है। यह चार सौ योजन ऊँचा है। इसी प्रकार आगेके तीन पर्वत भी अपने-अपने क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले जानने चाहिए। उनकी ऊँचाई क्रमशः चार सौ, दो सौ और सौ योजन जाननी चाहिए । इन सब पर्वतोंकी जड़ अपनी . ऊँचाईका एक-चौथाई भाग है। 8 388. अब इन पर्वतोंके वर्णविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-- ये छहों पर्वत क्रमसे सोना, चाँदी, तपाया हुआ सोना, वैडूर्यमणि, चाँदी और सोना इनके समान रंगवाले हैं ॥12॥ 1. संनिवेशो हैर- मु.। 2. -विभक्तः षट- मु.। 3. सीमन्यव- आ., दि. 1, दि. 2। 4. हरिवंशस्य च विभा- आ., दि. 1, दि. 21 5. -च्छ्रायः । महाविदेहस्य जा., दि. 1, दि. 21 6. -तव्यम् । पर्वता- मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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