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________________ 1581 सर्वार्थसिदौ [3110.8 3845 384. तत्र जमाद्वीपे षडभिः कलपर्वतैविभक्तानि सप्त क्षेत्राणि कानि तानीत्यत आह भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि 10100 1385. भरतावयः संज्ञा अनादिकालप्रवृत्ता अमिमित्ताः। तत्र भरतवर्षःक्व संनिविष्टः? दक्षिणविग्भागे हिमवतोऽद्रेस्त्रयाणां समुद्राणां मध्ये आरोपितचापाकारो भरतवर्षः। विजयान गङ्गासिन्धम्यां च विभक्तः स षट्खण्डः । क्षुद्रहिमवन्तमुत्तरेण दक्षिणेन महाहिमवन्तं पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये हैमवतवर्षः। निषषस्य दक्षिणतो महाहिमवत उत्तरतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तराले हरिवर्षः । निषषस्योत्तरान्नीलतो दक्षिणतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तरे विवेहस्य संनिवेशो द्रष्टव्यः । नीलत उत्तरात् (द्) रुक्मिणो दक्षिणात् पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये रम्यकवर्षः। रुक्मिण उत्तराच्छिखप्रथिवीके ऊपरी भागपर अवस्थित है। इसमें गोल आकारको लिये हुए और एकके बाद एकको घेरे हुए असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं । इन सबके बीचमें जम्बूद्वीप है । इसके बीचमें और दूसरा द्वीप समुद्र नहीं है। यद्यपि गोल तो सब द्वीप और समुद्र हैं पर वे सब चूड़ीके समान गोल हैं और यह थालोके समान गोल है । इसका व्यास एक लाख योजन है। इसके ठीक बीच में मेरु पर्वत है। यह एक लाख चालीस योजन ऊंचा है। इसमें से एक हजार योजन जमीन में है । चालीस योजनकी आखीरमें चोटी है और शेष निन्यानबे हजार योजनका समतलसे चूलिका तक है। प्रारम्भमें जमीनपर मेरु पर्वतका व्यास दस हजार योजन है । ऊपर क्रमसे घटता गया है। जिस हिसाबसे ऊपर घटा है उसी हिसाबसे जमीनमें उसका व्यास बढ़ा है। मेरु पर्वतके तीन काण्ड हैं। पहला काण्ड जमीनसे पांच सौ योजनका, दूसरा साढ़े बासठ हजार योजनका और तीसरा छत्तीस हजार योजनका है । प्रत्येक काण्डके अन्तमें एक-एक कटनी है। जिसका एक ओरका व्यास पाँचसौ योजन है। अन्तिम कटनीका व्यास मात्र छह योजन कम है। एक जमीनपर और तीन इन तीन कटनियोंपर इस प्रकार यह चार वनोंसे 'सुशोभित है। इनके क्रमसे भद्रसाल, नन्दन, सौमनस और पाण्डुक ये नाम हैं। पहली और दूसरी कटनीके बाद मेरु पर्वत सीधा गया है फिर क्रमसे घटने लगता है । इसके चारों वनोंमें चारों दिशाओंमें एक-एक वनमें चार-चार इस हिसाबसे सोलह चैत्यालय हैं। पाण्डुक वनमें चारों दिशाओं में चार पाण्डुक शिलाएं हैं जिनपर उस-उस दिशाके क्षेत्रोंमें उत्पन्न हुए तीर्थंकरोंका अभिषेक होता है। इसका रंग पीला है। 6384. इस जम्बूद्वीपमें छह कुलपर्वतोंसे विभाजित होकर जो सात क्षेत्र हैं वे कौन-से हैं ? इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं भरतवर्ष, हैमवतवर्ष, हरिवर्ष, विदेहवर्ष, रम्यकवर्ष, हैरव्यवतवर्ष और ऐरावतवर्ष ये सात क्षेत्र हैं ॥10॥ 8385. क्षेत्रोंकी भरत आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ रही हैं और अनिमित्तक हैं। इनमें से भरत क्षेत्र कहाँ स्थित है ? हिमवान् पर्वतके दक्षिणमें और तीन समुद्रोंके बीचमें चढ़े हुए धनुषके आकारवाला भरत क्षेत्र है जो विजयाध और गंगा-सिन्धुसे विभाजित होकर छह खण्डोंमें बँटा हुआ है। क्षुद्र हिमवान्के उत्तरमें और महाहिमवान्के दक्षिणमें तथा पूर्वपश्चिम समुद्रके बीच में हैमवत क्षेत्र है। निषधके दक्षिणमें और महाहिमवान्के उत्तरमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें हरिक्षेत्र है । निषधके उत्तरमें और नोलके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीच में विदेह क्षेत्रकी रचना है । नोलके उत्तरमें और रुक्मीके दक्षिणमें तथा पूर्व 1. क्षेत्राणि ||100 भिन्न-भिन्नानि भरता- आ. । 2. -याणां च समु- मु. । 3. विभक्तः षट- मु,। 4. नीलवत उत्त- आ., दि. 1, दि. 21 5. उत्तरः रुक्मिणो दक्षिणः मु.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org -
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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