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________________ 152] सर्वार्थसिद्धौ [31218361तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनेकनरकशतसहस्राणि पंच चैव यथाक्रमम् ॥2॥ 8 369. तासु रत्नप्रभादिषु भूमिषु नरकाण्यनेन संख्यायन्ते यथाक्रमम् । रत्नप्रभायां त्रिशम्नरकातसहस्राणि, शर्कराप्रभायां पञ्चविंशतिर्नर कशतसहस्राणि, वालुकाप्रभायां पञ्चदश नरकातसहस्राणि, पंकप्रभायां दश नरकशतसहस्राणि, धूमप्रभायां त्रीणि नरकशतसहस्राणि, तमःप्रभायां पञ्चोनमेकं नरकशतसहस्र, महातमःप्रभायां पञ्च नरकाणि । रत्नप्रभायां नरकप्रस्तारास्त्रयोदश । ततोऽध आ सप्तम्या द्वौ द्वौ नरकप्रस्तारो' हीनौ । इतरो विशेषो लोकानुयोगतो वेदितव्यः । $ 370. अथ तासु भूमिषु नारकाणां कः प्रतिविशेष इत्यत आह उन भूमियोंमें क्रमसे तीस लाख, पचीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच कम एक लाख और पाँच नरक हैं ।।2।। 8369. उन रत्नप्रभा आदि भूमियोंमें, इस सूत्र-द्वारा क्रमसे नरकोंकी संख्या बतलायी गयी है । रत्नप्रभामें तीस लाख नरक हैं । शर्कराप्रभामें पचीस लाख नरक हैं। वालुकाप्रभामें पन्द्रह लाख नरक हैं । पंकप्रभामें दश लाख नरक हैं । धूमप्रभामें तीन लाख नरक हैं। तमःप्रभामें पाँच कम एक लाख नरक हैं और महातमःप्रभामें पाँच नरक हैं। रत्नप्रभामें तेरह नरक पटल हैं। इससे आगे सातवी भूमि तक दो-दो नरक पटल कम हैं। इसके अतिरिक्त और विशे लोकानुयोगसे जान लेनी चाहिए। विशेषार्थ--पहले सात प्रथिवियोंका निर्देश किया ही है। उनमें से पहली पथिवीके तीन भाग हैं-खरभाग, पंकभाग और अब्बहुल भाग । खर भाग सबसे ऊपर है। इसमें रत्नोंकी बहुतायत है और यह सोलह हजार योजन मोटा है । दूसरा पंकभाग है, इसकी मोटाई चौरासी हजार योजन है ! तथा तीसरा अब्बहुल भाग है। इसकी मोटाई अस्सी हजार योजन है। नारकियोंके रहने के आवासको नरक कहते हैं । रत्नप्रभा भूमिके प्रथम भाग और दूसरे भाग में नरक नहीं हैं। तीसरे भागमें हैं। इस प्रकार प्रथम भूमिके तीसरे भागकी और शेष छह भूमियों की जितनी-जितनी मोटाई बतलायी है उसमें-से ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन भूमिको छोड़कर सातों भूमियोंके बाकीके मध्य भागमें नरक हैं। इनका आकार विविध प्रकारका है। कोई गोल हैं, कोई त्रिकोण हैं, कोई चौकोण हैं और कोई अनिश्चित आकारवाले हैं। ये सब नरकपटल क्रमसे अवस्थित है। जिस प्रकार पत्थर या मिट्टीके एक थरपर दूसरा थर अवस्थित होता है उसी प्रकार ये पटल हैं। पहली भूमिमें ये पटल तेरह हैं और आगेकी भूमियोंमें क्रमसे दो-दो पटल कम होते गये हैं । एक पटल दूसरे पटलसे सटा हुआ है। इनमें नरक हैं। नरक जमीनके भीतर कुएंके समान पोलका नाम है। यह ऊपर, नीचे चारों ओर जमीनसे घिरी रहती है। इन्हीं नरकोंमें नारकी जीव अपनी आयुके अन्तिम समय तक रहते हैं और वहाँ नाना प्रकारके दुःख भोगते हैं। 8370 उन भूमियोंमें रहनेवाले नारकियोंमें क्या विशेषता है इस बातको बतलानेके लिए अब आगे सूत्र को कहते हैं1.-सप्तम्या द्वं हूँ नरक-- आ. दि. 1, दि. 2। 2. -प्रस्तारा हीनाः। इतरो आ. दि. 1. दि. 2 । 2. लोकनियोगतो दि. 1, दि. 2 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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