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________________ सर्वार्थसिद्ध 8332. यथौवारिकस्येन्द्रियै रुपलब्धिस्तथेतरेषां कस्मान्न भवतीत्यत आहपरं परं सूक्ष्मम् ॥37॥ विवक्षातो व्यवस्थार्थगतिः । पृथग्भूतानां, 8333. 'पर' शब्दस्यानेकार्थवृत्तित्वेऽपि शरीराणां सूक्ष्मगुणेन वीप्सानिर्देशः क्रियते परम्परमिति । औदारिकं स्थूलम्, ततः सूक्ष्मं वैकिकिम्, ततः सूक्ष्मं आहारकम् ततः सूक्ष्मं तेजसम्, तेजसात्कार्मणं सूक्ष्ममिति । 8334. यदि परस्परं सूक्ष्मम्, प्रदेशतोऽपि न्यूनं परम्परं हीनमिति विपरीतप्रतिपत्तिनिवृत्यर्थमाह 140] प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् 13811 8335. प्रदिश्यन्त इति प्रदेशाः परमाणवः । संख्यामतीतोऽसंख्येयः । असंख्येयो गुणोऽस्य तदिदमसंख्येयगुणम् । कुतः ? प्रदेशतः । नावगाहतः । परम्परमित्यनुवृत्तेरा कार्मणात्प्रसङ्ग तन्निवृत्त्यर्थमाह प्राक्तैजसादिति । औदारिकादसंख्येयगुणप्रदेश वैक्रियिकम् । वैऋियिकाद संख्येयगुणप्रदेशमाहारकमिति । को गुणकारः । पत्योपमासंख्येयभागः । यद्येवम्, परम्परं महापरिमाणं प्राप्नोति ? नैवम्; बन्धविशेषात्परिमाणभेदाभावस्तूलनिचयायः पिण्डवत् । 8336. अथोत्तरयोः किं समप्रदेशत्वमुतास्ति कश्विद्विशेष इत्यत आह 332. जिस प्रकार इन्द्रियाँ औदारिक शरीरको जानती हैं उस प्रकार इतर शरीरोंको क्यों नहीं जानतीं ? अब इस बात को दिखलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं आगे-आगेका शरीर सूक्ष्म है ॥37॥ § 333. पर शब्दके अनेक अर्थ हैं तो भी यहाँ विवक्षासे व्यवस्थारूप अर्थका ज्ञान होता है । यद्यपि शरीर अलग-अलग हैं तो भी उनमें सूक्ष्म गुणका अन्वय है यह दिखलानेके लिए 'परम्परम्' इस प्रकार वीप्सा निर्देश किया है । औदारिक शरीर स्थूल है । इससे वैक्रियिक शरीर सूक्ष्म है । इससे आहारक शरीर सूक्ष्म है। इससे तेजस शरीर सूक्ष्म है और इससे कार्मण शरीर सूक्ष्म है। [2137 § 332 8334. यदि ये उत्तरोत्तर शरीर सूक्ष्म हैं तो प्रदेशोंकी अपेक्षा भी उत्तरोत्तर हीन होंगे । इस प्रकार विपरीत ज्ञानका निराकरण करने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं तैजससे पूर्व तीन शरीरोंमें आगे-आगेका शरीर प्रदेशोंकी अपेक्षा असंख्यातगुणा है || 38|| $ 335. प्रदेश शब्द की व्युत्पत्ति 'प्रदिश्यन्ते' होती है । इसका अर्थ परमाणु है । संख्यातीतको असंख्येय कहते हैं। जिसका गुणकार असंख्यात है वह असंख्येयगुणा कहलाता है । शंकाकिसकी अपेक्षा ? समाधान प्रदेशोंकी अपेक्षा, अवगाहनकी अपेक्षा नहीं । पूर्व सूत्रमें 'परम्परम्' इस पदी अनुवृत्ति होकर असंख्येयगुणत्वका प्रसंग कार्मण शरीर तक प्राप्त होता है अतः उसकी निवृत्तिके लिए सूत्र में 'प्राक् तैजसात्' पद रखा है । अर्थात् तैजस शरीरसे पूर्ववर्ती शरीर तक ये शरीर उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे हैं । औदारिक शरीरसे वैक्रियिक शरीर असंख्यातगुणे प्रदेशवाला है । शंका- गुणकारका प्रमाण क्या है ? समाधानं - पल्यका असंख्यातवाँ भाग । शंका- यदि ऐसा है तो उत्तरोत्तर एक शरीरसे दूसरा शरीर महापरिमाणवाला प्राप्त होता है ? समाधानयह कोई दोष नहीं है, क्योंकि बन्धविशेषके कारण परिमाणमें भेद नहीं होता । जैसे रूईका ढेर और लोहेका गोला । 8336. आगे दो शरीरोंके प्रदेश क्या समान हैं या उनमें भी कुछ भेद है। इस बात 1. - प्रदेशतः । परस्पर-ता, ना । 2. प्राप्नोति । बन्ध--ता । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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