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________________ [133 -21268 312] द्वितीयोऽध्यायः $ 310. विग्रहो देहः। विग्रहार्था गतिविग्रहर्गातः। अथवा विरुद्धो ग्रहो विग्रहो व्याघातः । कर्मादानेऽपि नोकर्मपुद्गलादाननिरोध इत्यर्थः । विग्रहेण गतिविग्रहगतिः । सर्वशरीरप्ररोहणबीजभूतं कार्मणं शरीरं कर्मेत्युच्यते । योगो वाङ्मनसकायवर्गणानिमित्त आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः । कर्मणा कृतो योगः कर्मयोगो विग्रहगतौ भवतीत्यर्थः । तेन .कर्मादानं देशान्तरसंक्रमश्च भवति । 311. आह जीवपुद्गलानां गतिमास्कन्दतां देशान्तरसंक्रमः किमाकाशप्रदेशक्रमवृत्त्या भवति, उताविशेषणेत्यत आह __ अनुश्रेणि गतिः ॥26॥ 8312. लोकमध्यादारभ्य ऊर्ध्वमस्तिर्यक च आकाशाप्रदेशानां क्रमसंनिविष्टानां पतितः श्रेणिः इत्युच्यते । 'अनु'शब्दस्यानपुर्येण वत्तिः। श्रेणेरानुपयेणानुश्रेणीति जीवानां पुदगलानां च गतिर्भवतीत्यर्थः । अनधिकृतानां पुद्गलानां कयं ग्रहणमिति चेत् । गतिग्रहणात् । यदि जीवानामेव गतिरिष्टा स्याद् गतिग्रहणमनर्थकम् ; अधिकारात्तत्सिद्धेः। उत्तरत्र जीवग्रहणाच्च पुद्गलसंप्रत्ययः । ननु चन्द्रादीनां ज्योतिष्काणां मेरुप्रदक्षिणाकाले विद्याधरादीनां च विश्रेणिगतिरपि दृश्यते, तत्र किमुच्यते, 'अनुश्रेणि गतिः' इति । कालदेशनियमोऽत्र वेदितव्यः। तत्र कालनियम 8310. विग्रहका अर्थ देह है। विग्रह अर्थात शरीरके लिए जो गति होती है वह विग्रह गति है । अथवा विरुद्ध ग्रहको विग्रह कहते हैं जिसका अर्थ व्याघात है । तात्पर्य यह है कि जिस अवस्थामें कर्मके ग्रहण होनेपर भी नोकर्मरूप पुद्गलोंका ग्रहण नहीं होता वह विग्रह है और इस विग्रहके साथ होनेवाली गतिका नाम विग्रहगति है । सब शरीरोंकी उत्पत्तिके मूलकारण कार्मण शरीरको कर्म कहते हैं । तथा वचनवर्गणा, मनोवर्गणा और कायवर्गणाके निमित्तसे होनेवाले आत्मप्रदेशोंके हलनचलनको योग कहते हैं। कर्मके निमित्तसे जो योग होता है वह कर्मयोग है । वह विग्रहगतिमें होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इससे नूतन कर्मका ग्रहण और एक देशसे दूसरे देशमें गमन होता है। $311. गमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंका एक देशसे दूसरे देश में गमन क्या आकाशप्रदेशोंकी पंक्तिक्रमसे होता है या इसके बिना होता है, अब इसका खुलासा करने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं गति श्रेणीके अनुसार होती है ॥26॥ 8312. लोकके मध्यसे लेकर ऊपर नीचे और तिरछे क्रमसे स्थित आकाशप्रदेशोंकी पंक्तिको श्रेणी कहते हैं । अनु शब्द 'आनुपूर्वी' अर्थमें समसित है। इसलिए 'अनुश्रेणि' का अर्थ 'श्रेणीकी आनुपूर्वीसे' होता है । इस प्रकारकी गति जीव और पुद्गलोंकी होती है यह इसका भाव है । शंका--पुद्गलोंका अधिकार न होनेसे यहाँ उनका ग्रहण कैसे हो सकता है ? समाधान-सूत्र में गतिपदका ग्रहण किया है इससे सिद्ध हुआ कि अनधिकृत पुद्गल भी यहाँ विवक्षित हैं । यदि जीवोंकी गति ही इष्ट होती तो सूत्रमें गति पदके ग्रहण करनेकी आवश्यकता न थी, क्योंकि गति पदका ग्रहण अधिकारसे सिद्ध है । दूसरे अगले सूत्र में जीव पदका ग्रहण किया है, इसलिए इस सूत्रमें पुद्गलोंका भी ग्रहण इष्ट है यह ज्ञान होता है । शंका--चन्द्रमा आदि ज्योतिषियोंको और मेरुकी प्रदक्षिणा करते समय विद्याधरोंकी विश्रेणी गति देखी जाती है, इसलिए जीव और पुद्गलोंको अनुश्रेणी गति होती है यह किसलिए कहा ? समाधान यहाँ कालनियम और देशनियम जानना चाहिए । कालनियम यथा--मरणके समय जब जीव एक भवको छोड़कर 1. -व्याघातः । नोकर्म-ता., ना.। 2. -रानुपूर्वेणा- आ.। 3. ज्योतिषां आ., दि. 1, दि. 2 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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