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________________ 132] सर्वार्थसिदी [2124 8308 संज्ञिनः समनस्काः ॥24॥ 8308. मनो व्याख्यातम् । सह तेन ये वर्तन्ते ते समनस्काः । संजिन इत्युच्यन्ते । पारिशेष्यादितरे संसारिणः प्राणिनोऽसशिन इति सिद्धम् । ननु च संजिन इत्यनेनैव गतार्थत्वात्समनस्का इति विशेषणमनर्थकम् । यतो मनोव्यापारो हिताहितप्राप्तिपरिहारपरीक्षा। संज्ञापि सैवेति । तद्युक्तम्, संज्ञाशब्दार्थव्यभिचारात् । संज्ञा नामेत्युच्यते । तद्वन्तः संशिन इति सर्वेषामतिप्रसङ्गः । संज्ञा ज्ञानमिति चेत् सर्वेषां प्राणिनां ज्ञानात्मकत्वादतिप्रसङ्गः। आहारादिविषयाभिलाषः संझेति चेत् । तुल्यम् । तस्मात्समनस्का इत्युच्यते । एवं च कृत्वा गर्भाण्डजमूच्छितसुषप्त्याचवस्थासु हिताहितपरीक्षाभावेऽपि मनःसंनिधानात्संज्ञित्वमुपपन्नं भवति। 6309. यदि हिताहितादिविषयपरिस्पन्दः प्राणिनां मनःप्रणिधानपूर्वकः । अथाभिनवशरीरग्रहणं प्रत्यापूर्णस्य विशोगपूर्व मूर्तनिर्मनस्कस्य यत्कर्म तत्कुत इत्युच्यते विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥25॥ मनवाले जीव संज्ञी होते हैं ॥24॥ 8308. मनका व्याख्यान कर आयेही उसके साथ जो रहते हैं वे समनस्क कहलाते हैं। और उन्हें ही संज्ञी कहते हैं । परिशेष न्यायसे यह सिद्ध हुआ कि इनसे अतिरिक्त जितने संसारी जीव होते हैं वे सब असंज्ञी होते हैं। शंका--सूत्रमें 'संज्ञिनः' इतना पद देनेसे ही काम चल जाता है, अत: 'समनस्काः' यह विशेषण देना निष्फल है, क्योंकि हितकी प्राप्ति और अहितके त्यागकी परीक्षा करने में मनका व्यापार होता है और यही संज्ञा है ? समाधान-यह कहना उचित नहीं, क्योंकि संज्ञा शब्दके अर्थ में व्यभिचार पाया जाता हैं । अर्थात् संज्ञा शब्दके अनेक अर्थ हैं । संज्ञाका अर्थ नाम है। यदि नामवाले जीव संज्ञी माने जायँ तो सब जीवोंको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है। संज्ञाका अर्थ यदि ज्ञान लिया जाता है तो भी सभी प्राणी ज्ञानस्वभाव होनेसे सबको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है। यदि आहारादि विषयोंकी अभिलाषाको संज्ञा कहा जाता है तो भी पहलेके समान दोष प्राप्त होता है । अर्थात् आहारादि विषयक अभिलाषा सबके पायी जाती है, इसलिए भी सबको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है । चूंकि ये दोष न प्राप्त हों अतः सूत्रमें 'समनस्काः ' यह पद रखा है। इससे यह लाभ है कि गर्भज, अण्डज, मूच्छित और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंमें हिताहितकी परीक्षाके न होनेपर भी मनके सम्बन्धसे संज्ञीपना बन जाता हैं। विशेषार्थ-प्रायः एकेन्द्रिय आदि प्रत्येक जीव अपने इष्ट विषयमें प्रवृत्ति करता है और अनिष्ट विषयसे निवृत्त होता है, फिर भी मनको स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है सो इसका कारण यह है कि तुलनात्मक अध्ययन, लोक-परलोकका विचार, हिताहितका विवेक आदि कार्य ऐसे हैं जो मनके बिना नहीं हो सकते। इसीसे मनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है। यह मन जिनके होता है वे संज्ञी होते हैं अन्य नहीं । जीवोंका संज्ञी और असंज्ञी यह भेद पंचेन्द्रिय जीवोंमें ही पाया जाता है । अन्य एकेन्द्रियसे लेकर चतुरिन्द्रिय तकके जीव तो असंज्ञी ही होते हैं। अर्थात् उनके मन न होनेसे वे उक्त प्रकारके ज्ञानसे वंचित रहते हैं। 6309. यदि जीवोंके हित और अहित आदि विषयके लिए क्रिया मनके निमित्तसे होती है तो जिसने पूर्व शरीरको छोड़ दिया है और जो मनरहित है ऐसा जीव जब नूतन शरीर को ग्रहण करनेके लिए उद्यत होता है तब उसके जो क्रिया होती है वह किस निमित्तसे होती है यही बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं विहगतिमें कार्मणकाय योग होता है ॥25॥ 1. -शिनः उच्य-दि. 1, दि. 2, आ.। 2. -नर्थकम् । मनो---ता. ना.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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