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________________ - 2123 8307] द्वितीयोऽध्यायः [131 $ 304. एकं प्रथममित्यर्थः । किं तत् ? स्पर्शनम् । तत्केषाम् ? पृथिव्यादीनां वनस्पत्यनहानां वेदितव्यम् । तस्योत्पत्तिकारणमुच्यते- वीर्यान्तरायस्पर्शनेन्द्रियावरणक्षयोपशमे सद शेषेन्द्रियसर्वघातिस्पर्षकोदये च शरीरनामलाभावष्टम्भे एकेन्द्रियजातिनामोदयवशतितायां व सत्यां स्पर्शनमेकमिन्द्रियमाविर्भवति । 5 305. इतरेषामिन्द्रियाणां स्वामित्वप्रदर्शनार्थमाह-- कृमिपिपीलकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ।। 23॥ 306. 'एकंकम्' इति वीप्सायां द्वित्वम् । एककेन वृद्धानि एकंकवद्धानि । कृमिमादि कृत्वा, स्पर्शनाधिकारात् स्पर्शनमादि कृत्वा एककवृद्धानीत्यभिसंबन्धः क्रियते । 'आदि'शब्दः प्रत्येक परिसमाप्यते । कृम्यादीनां स्पर्शमं रसनाधिकम्, पिपीलिकादीनां स्पर्शनरसने घाणधिके, भ्रमरादीनां स्पर्शनरसनधाणानि चक्षुरधिकानि, मनुष्यादीनां तान्येव श्रोत्राधिकानीति यथासंख्येनाभिसंबन्धो न्याख्यातः। तेषां निष्पत्तिः स्पर्शनोत्पत्त्या व्याख्याता उत्तरोत्तरसर्वघाति: स्पर्धकोदयेन। $307: एवमेतेषु संसारिषु द्विभेदेषु इन्द्रियभेदात्पञ्चविधेषु ये पञ्चेन्द्रियास्तद्भवस्यानुक्तस्य प्रतिपादनार्थमाह 8304. सूत्रमें आये हुए 'एक' शब्दका अर्थ प्रथम है। शंका-यह कौन है ? समाधानस्पर्शन | शंका-वह किन जीवोंके होती है ? समाधान-प्रथिवीकायिक जीवोंसे लेकर वनस्पतिकायिक तकके जीवोंके जानना चाहिए । अब उसकी उत्पत्तिके कारंणका कथन करते हैं-वीर्यान्तराय तथा स्पर्शन इन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमके होनेपर और शेष इन्द्रियोंके सर्वघाती स्पर्धकोंके उदयके होनेपर तथा शरीर नामकर्मके आलम्बनके होनेपर और एकेन्द्रिय जाति नामकर्मके उदयकी आधीनताके रहते हुए एक स्पर्शन इन्द्रिय प्रकट होती है। 8305. अब इतर इन्द्रियोंके स्वामित्वका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैंकृमि, पिपीलिका, भ्रमर और मनुष्य आदिके क्रमसे एक-एक इन्द्रिय अधिक होती है ।।23। 8306. 'एकैकम्' यह वीप्सामें द्वित्व है । इन्द्रियाँ एक-एकके क्रमसे बढ़ी हैं इसलिए वे 'एकैकवृद्ध' कही गयी हैं। ये इन्द्रियाँ कृमिसे लेकर बढ़ी हैं । स्पर्शन इन्द्रिय का अधिकार है, अतः स्पर्शन इन्द्रियसे लेकर एक-एकके क्रमसे बढ़ी हैं इस प्रकार यहा सम्बन्ध कर लेना चाहिए। आदि शब्दका प्रत्येकके साथ सम्बन्ध होता है। जिससे यह अर्थ हुआ कि कृमि आदि जीवोंके स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियाँ होती हैं । पिपीलिका आदि जीवोंके स्पर्शन, रसना और घ्राण ये तीन इन्द्रियाँ होती हैं। भ्रमर आदि जीवोंके स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु ये चार इन्द्रियाँ होती हैं। मनुष्यादिकके श्रोत्र इन्द्रियके और मिला देनेपर पाँच इन्द्रियाँ होती हैं। इस प्रकार उक्त जीव और इन्द्रिय इनका यथाक्रमसे सम्बन्धका व्याख्यान किया। पहले स्पर्शन इन्द्रियकी उत्पत्तिका व्याख्यान कर आये हैं उसी प्रकार शेष इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका व्याख्यान करना चाहिए। किन्तु उत्पत्तिके कारणका व्याख्यान करते समय जिस इन्द्रियकी उत्पत्तिके कारणका व्याख्यान किया जाय, वहाँ उससे अगली इन्द्रिय सम्बन्धी सर्वघाती स्पर्धकोंके उदयके साथ वह व्याख्यान करना चाहिए। $307. इस प्रकार इन दो प्रकारके और इन्द्रिय-भेदोंकी अपेक्षा पाँच प्रकारके संसारी जीवों में जो पंचेन्द्रिय जीव हैं उनके भेद नहीं कहे, अतः उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं 1.-किस्यादि आ.। -कृम्यादि दि. 1, दि.2। - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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