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________________ [123 -2112 5 284] द्वितीयोऽध्यायः $ 281. य एते संसारिणस्ते द्विविधाः समनस्कामनस्काः ॥11॥ 8 282. मनो द्विविधम्-द्रव्यमनो भावमनश्चेति । तत्र पुद्गलविपाकिकर्मोदयापेक्ष द्रव्यमनः । वीर्यान्तरायनोइन्द्रियावरणक्षयोपशमापेक्षा आत्मनो विशुद्धिर्भावमनः। तेन मनसा सह वर्तन्त इति समनस्काः। न विद्यते मनो येषां त इमे अमनस्काः । एवं मनसो भावाभावाभ्यां संसारिणो द्विविधा विभज्यन्ते । समनस्काश्वामनस्काश्च समनस्कामनस्का इति। अभ्यहितत्वात्समनस्कशब्दस्य पूर्वनिपातः । कयमभ्यहितत्वम् ? गुणदोषविचारकत्वात् । 8283. पुनरपि संसारिणां भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥12॥ $ 284. 'संसारि' ग्रहणमनर्थकम् ; प्रकृतत्वात् । क्व प्रकृतम् ? 'संसारिणो मुक्ताश्च' इति । नानर्थकम्, पूर्वापेक्षार्थम् । ये उक्ताः समनस्का अमनस्कास्ते संसारिण इति। यदि हि पूर्वस्य विशेषणं न स्यात्, समनस्कामनस्क ग्रहणं संसारिणो मुक्ताश्चेत्यनेन यथासंख्यमभिसंबध्येत । और कषायस्थान विवक्षित हैं। इन द्रव्यादिके निमित्तसे संसारमें जीवका परिभ्रमण किस प्रकार होता रहता है यही यहाँ बतलाया गया है। इन परिवर्तनोंके होनेमें उत्तरोत्तर अधिक-अधिक काल लगता है। मुख्यरूपसे जीवका संसार सम्यग्दर्शनके प्राप्त होनेके पूर्वतक माना गया है, इससे ये परिवर्तन जीवको मिथ्यात्व अवस्थामें होते हैं यह सिद्ध होता है । सम्यग्दर्शनके होनेपर जीवका ईषत् संसार शेष रहनेपर भी वह इन परिवर्तनोंसे मुक्त हो जाता है । पूर्ण मोक्ष मुक्त अवस्था में होता है । इसीसे जीवके संसारी और मुक्त ये दो भेद किये गये हैं। $ 281. पहले जो संसारी जीव कह आये हैं वे दो प्रकारके हैं । आगेके सूत्र-द्वारा इसी बातको बतलाते हैं मनवाले और मनरहित ऐसे संसारी जीव हैं ॥11॥ 8282. मन दो प्रकारका है----द्रव्यमन और भावमन । उनमें-से द्रव्यमन पुदगलविपाकी अंगोपांग नामकर्मके उदयसे होता है तथा वीर्यान्तराय और नोइन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमकी अपेक्षा रखनेवाले आत्माको विशुद्धिको भावमन कहते हैं। यह मन जिन जीवोंके पाया जाता है वे समनस्क हैं। और जिनके मन नहीं पाया जाता है वे अमनस्क हैं। इस प्रकार मनके सद्भाव और असद्भावको अपेक्षा संसारो जीव दो भागोंमें बँट जाते हैं। 'समनस्कामनस्काः' इसमें समनस्क और अमनस्क इस प्रकार द्वन्द्व समास है। समनस्क शब्द श्रेष्ठ है अत: उसे सत्रमें पहले रखा । शंका---श्रेष्ठता किस कारणसे है ? समाधान----क्योंकि समनस्क जीव गुण और दोषोंके विचारक होते हैं, इसलिए समनस्क पद श्रेष्ठ है। $ 283. अब फिरसे भी संसारी जीवोंके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैंतथा संसारी जीव त्रस और स्थावरके भेदसे दो प्रकार हैं॥12॥ 8 284. शंका--सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना निरर्थक है, क्योंकि वह प्रकरण प्राप्त है ? प्रतिशंका-इसका प्रकरण कहाँ है ? शंकाकार----'संसारिणों मुक्ताश्च' इस सूत्रमें उसका प्रकरण है । समाधान----सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना अनर्थक नहीं है, क्योंकि पूर्व सूत्रकी अपेक्षा इस सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण किया है । तात्पर्य यह है कि पूर्व सूत्रमें जो समनस्क और अमनस्क जीव बतलाये हैं वे संसारी हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए इस सूत्रमें 'संसारी' पद दिया है । यदि 'संसारी' पदको पूर्वका विशेषण न माना जाय तो समनस्क और अमनस्क 1.-पेक्षया आत्मनो मु., ता.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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