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________________ 124) सर्वार्थसिद्धी -2112 6 284] एवं च कृत्वा 'संसारि'ग्रहणमादौ क्रियमाणभुपपन्नं भवति । तत्पूर्वापेक्ष सदुत्तरार्थमपि भवति । ते संसारिणो द्विविधाः-प्रसाः स्थावरा इति । असनामकर्मोदयवशीकृतास्त्रसा। स्थावरनामकर्मोवयवशवर्तिनः स्थावराः । त्रस्यन्तीति त्रसाः, स्थानशीलाः स्थावरा इति चेत् ? न; आगमविरोषात् । आगमे हि कायानुवादेन सा द्वीन्द्रियादारभ्य आ अयोगकेवलिन इति । तस्मान्न चलनाचलनापेक्षं त्रसस्थावरत्वम् । कर्मोदयापेक्षमेव । त्रसग्रहणमादौ क्रियते; अल्पाच्तरत्वादभ्यहितत्वाचा सर्बोपयोगसंभवावाहितत्वम् । 8 285. एकेन्द्रियाणामतिबहुवक्तव्याभावादुल्लच्यानुपूर्वी स्थावरभेवप्रतिपत्त्यर्थमाह .. पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥13॥ 8 286. स्थावरनामकर्मभेदाः पृथिवीकायादयः सन्ति। तदुदयनिमित्ता' जीवेषु पृथिव्यावयः संज्ञा वेवितम्बाः। प्रवनाविप्रकृतिनिष्पन्ना अपि रूढिवशात्प्रथनाधनपेक्षा वर्तन्ते । एषां पृथिव्यादीनामा चातुर्विध्यमुक्तं प्रत्येकम् । तत्कयमिति चेत् ? उच्यते-पृथिवी पृथिवीकायः पृथिवीकायिकः पृथिबीजीव इत्यादि । तत्र अचेतना वैश्रसिकपरिणामनिवृत्ता काठिन्यगुणात्मिका पृथिवी । अचेतनत्वावसत्वपि पृथिवीकायनामकर्मोदये प्रथनक्रियोपलक्षितवेयम् । अथवा पृथिवीति सामान्यम् । इनका संसारी और मुक्त इनके साथ क्रमसे सम्बन्ध हो जायेगा। और इस अभिप्रायसे 'संसारिणो' पदका इससूत्रक आदिम ग्रहण करना बन जाता है। इस प्रकार 'संसारिणो' पदका ग्रहण पूर्व सत्र को अपेक्षासे होकर अगले सूत्रके लिए भी हो जाता है । यथा--वे संसारो जीव दो प्रकारक है प्रस और स्थावर । जिनके त्रस नामकर्मका उदय है वे त्रस कहलाते हैं और जिनके स्थावर नाम कर्मका उदय है उन्हें स्थावर कहते हैं। शंका---'त्रस्यन्ति' अर्थात् जो चलते-फिरते हैं वे अस हैं और जो स्थिति स्वभाववाले हैं वे स्थावर हैं, क्या त्रस और स्थावरका यह लक्षण ठीक है ? समाधान-यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने में आगमसे विरोध आता है, क्योंकि कायानुवादकी अपेक्षा कथन करते हुए आगम में बतलाया है कि द्वीन्द्रिय जीवोंसे लेकर अयोगकेवली तकके सब जीव त्रस हैं, इसलिए गमन करने और न करनेकी अपेक्षा त्रस और स्थावर यह भेद नहीं है, किन्तु त्रस और स्थावर कर्मोके उदयकी अपेक्षासे ही है। सूत्रमें त्रसपदका प्रारम्भमें ब्रहण किया है, क्योंकि स्थावर पदसे इसमें कम अक्षर हैं और यह श्रेष्ठ है । स श्रेष्ठ इसलिए है कि इनकं सब उपयोगोंका पाया जाना सम्भव है। 8285. एकेन्द्रियोंके विषयमें अधिक वक्तव्य नहीं है, इसलिए आनुपूर्वी को छोड़कर पहले स्थावरके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक ये पाँच स्थावर हैं ॥13॥ 8 286. पृथिवीकाय आदि स्थावर नामकर्मके भेद हैं । उनके उदयके निमित्तसे जीवोंके पृथिवी आदिक नाम जानने चाहिए । यद्यपि ये नाम प्रथन आदि धातुओंसे बने हैं तो भी ये रोटिक हैं, इसलिए इनमें प्रथन आदि धर्मोकी अपेक्षा नहीं है । शंका--आर्ष में ये पृथिवी आदिक अलग-अलग चार प्रकारके कहे हैं सो ये चार-चार भेद किस प्रकार प्राप्त होते हैं ? समाधानपृथिवी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव ये पृथिवीके चार भेद हैं। इनमें से जो अचेतन है, प्राकृतिक परिणमनोंसे बनी है और कठिन गुणवाली है वह पृथिवी है । अचेतन होनेसे यद्यपि इसमें पृथिवी नामकर्मका उदय नहीं है तो भी प्रथनक्रियासे उपलक्षित होनेके कारण 1. भवति । संसा-मु.। 2. सनाम आ., दि. 1, दि. 2, ता. । 3. -रिमित्ता अमी इति जीवेषु मु. ना. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org -
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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