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________________ 122] सर्वार्थसिद्धौ [2110 8 279~अनुभवाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येयलोकपरिसमाप्तेः। एवं तामेव स्थितिमापद्यमानरय द्वितीयं करायाध्यवसायस्थानं भवति । तस्याप्यनुभवाध्यवसायस्थानानि योगस्थानानि च पूर्ववद्वेदितव्यानि। एवं तृतीयादिष्वपि कलायाध्यवसायस्थानेष आ असंख्येयलोकपरिसमाप्लेव द्धिक्रमो वेदितव्यः। उक्ताया जघन्यायाः स्थितेः समयाधिकायाः कषायादिस्थानानि पूर्ववत् । एवं समयाधिकक्रमेण आ उत्कृष्टस्थितेस्त्रिशत्सागरोपमकोटोकोटीपरिमितायाः कषायादिस्थानानि वेदितव्यानि । अनन्तभागवृद्धिः असंख्येयभागवृद्धिः संख्येयभागवृद्धिः संख्येयगुणवृद्धिः असंख्येयगुणवृद्धिः अनन्तगुणवृद्धिः इमानि षट् वृद्धिस्थानानि । हानिरपि तथैव । अनन्तभागवृद्ध्यनन्तगुणवृद्धिरहितानि चत्वारि स्थानानि । एवं सर्वेषां कर्मणां मूलप्रकृतीनामुत्तरप्रकृतीनां च परिवर्तनकमो वेदितव्यः । तदेतत्सर्वं समुदितं भावपरिवर्तनम् । उक्तं च 3'सव्व। पयडिट्ठिदीओ अणुभागपदेसबंधठाणाणि । मिच्छत्तसंसिदेण य भमिदा पुण भावसंसारे ॥" 8 280. उक्तात्पञ्चविधात्संसारान्निवृत्ता ये ते मुक्ताः । संसारिणां प्रागुपादानं तत्पूर्वकत्वान्मुक्तव्यपदेशस्य। एक-एक कषायअध्यवसायस्थानके प्रति असंख्यात लोकप्रमाण अनुभागअध्यवसायस्थान होते हैं और एक-एक अनुभागअध्यवसायस्थानके प्रति जगश्रेणीके असंख्यातवे भागप्रमाण योगस्थान होते हैं। इस प्रकार असंख्यात लोकप्रमाण कषायअध्यवसायस्थानोंके होने तक तीसरे आदि कषायअध्यवसायस्थानोंमें वृद्धिका क्रम जानना चाहिए। जिस प्रकार सबसे जघन्य स्थितिके कषायादि स्थान कहे हैं उसी प्रकार एक समय अधिक जघन्य स्थितिके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए और इसी प्रकार एक-एक समय अधिकके क्रमसे तोस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थितितक प्रत्येक स्थितिविकल्पके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए। अनन्त भागवृद्धि, असंख्यात भागवृद्धि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यात गुणवृद्धि और अनन्त गुणवृद्धि इस प्रकार ये वृद्धिके छह स्थान हैं तथा इसी प्रकार हानि भी छह प्रकारकी है। इनमेंसे अनन्त भागवद्धि और अनन्त गुणवृद्धि इन दो स्थानोंके कम कर देनेपर चार स्थान होते हैं। इसी प्रकार सब मूल प्रकृतियोंका और उनकी उत्तर प्रकृतियोंके परिवर्तनका क्रम जानना चाहिए। यह सब मिलकर एक भावपरिवर्तन होता है। कहा भी है.--. 'इस जीवने मिथ्यात्वके संसर्गसे सब प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्धके स्थानों को प्राप्त कर भावसंसारमें परिभ्रमण किया।' 8 280. जो उक्त पाँच प्रकारके संसारसे निवृत्त हैं वे मुक्त हैं । सूत्र में 'संसारि' पदका पहले ग्रहण किया, क्योंकि 'मुक्त' यह संज्ञा संसारपूर्वक प्राप्त होती है।। विशेषार्थ----जीवके मुख्य भेद दो हैं---संसारी और मुक्त । ये भेद जीवकी बद्ध और अबद्ध अवस्थाको ध्यान में रखकर किये गये हैं। वस्तुत: ये जीवकी दो अवस्थाएँ हैं। पहले जोव बट अवस्थामें रहता है. इसलिए उसे संसारी कहते हैं और बाद में उसके मुक्त होनेपर वही मक्त कहलाता है। जीवका संसार निमित्त-सापेक्ष होता है, इसलिए इस अपेक्षासे संसारके पाँच भेद किये गये हैं-द्रव्यसंसार, क्षेत्रसंसार, कालसंसार, भवसंसार और भावसंसार। इनका दूसरा नाम परिवर्तन भी है। द्रव्य पदसे कर्म और नोकर्म लिये गये हैं, क्षेत्र पद से लोकाकाशके प्रदेशोंका ग्रहण किया है, काल पदसे उत्सर्पिणी और अवसर्पिणो सम्बन्धी समयका ग्रहण किया है, भव पदसे जीवकी नर नारक आदि अवस्थाओंका ग्रहण किया है और भाव पदसे जीवके योग 1. पूर्ववदेकसम-मु.। 2. ---स्थानानि (पूर्ववत्) वेदि-मु.। 3. बा. अणु. गा. 29 । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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