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________________ 120] सर्वार्थसिद्धौ [2110 8 278स्तत्रैव जनित्वा पुनरेकैकप्रदेशाधिकभावेन सर्वो लोक आत्मनो जन्मक्षेत्रभावमुपनीतो भवति याव'त्तावत्क्षेत्रपरिवर्तनम् । उक्तं च---- 1"सव्वम्हि लोयखेत्ते कमसो तं णत्थि जंण उप्पण्णं । ____ ओगाहणाए- बहुसो परिभमिदो खेत्तसंसारे॥" 8277. कालपरिवर्तनमुच्यते----उत्सपिण्याः प्रथमसमये जातः कश्चिज्जीवः स्वायुषः परिसमाप्तौ मृतः । स एव पुनद्वितीयाया उत्सपिण्या द्वितीयसमये जातः स्वायुषः क्षयान्मृतः । स एव पुनस्तृतीयाया उत्सपिण्यास्तृतीयसमये जातः । एवमनेन क्रमेणोत्सपिणी परिसमाप्ता। तथावसर्पिणी च । एवं जन्मनरन्तर्यमुक्तम् । मरणस्यापि नैरन्तयं तथैव ग्राह्यम् । एतावत्कालपरिवर्तनम् । उक्तं च---- 5लस्सप्पिणिअवसप्पिणिसमयावलियासु णिरवसेसासु। जादो मुदो य बहुसो भमणेण दु कालसंसारे ॥" 8278. भवपरिवर्तनमुच्यते----नरकगतौ सर्वजघन्यमायुर्दशवर्षसहस्राणि । तेनायुषा तत्रोत्पन्नः पुनः परिभ्रम्य तेनेवायुषा जातः । एवं दशवर्षसहस्राणां यावन्तः समयास्तावत्कृत्वस्तव जातो मतः । पूनरेकैकसमयाधिकभावेन त्रयस्त्रिशत्सागरोपमाणि परिसमापितानि । ततः प्रच्यत्य तिर्यग्गतावन्तर्मुहुर्तायुः समुत्पन्नः । पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त्रीणि पल्योपमानि तेन परिसमापितानि । उत्पन्न हुआ। इस प्रकार घनांगुलके असंख्यातवें भागमें आकाशके जितने प्रदेश प्राप्त हों उतनी बार वहीं उत्पन्न हुआ। पून: उसने आकाशका एक-एक प्रदेश बढ़ाकर सब लोकको अपना जन्मक्षेत्र बनाया। इस प्रकार यह सब मिलकर एक क्षेत्रपरिवर्तन होता है । कहा भी है ___'सब लोक क्षेत्रमें ऐसा एक प्रदेश नहीं है जहाँ यह अवगाहनाके साथ क्रमसे नहीं उत्पन्न हुआ । इस प्रकार इस जीवने क्षेत्र संसारमें अनेक बार परिभ्रमण किया।' 8277. अब कालपरिवर्तनका कथन करते हैं कोई जीव उत्सर्पिणीके प्रथम समयमें उत्पन्न हुआ और आयुर्के समाप्त हो जानेपर मर गया । पुनः वही जीव दूसरी उत्सर्पिणीके दूसरे समयमें उत्पन्न हुआ और अपनी आयुके समाप्त होनेपर मर गया। पुन: वही जीव तीसरी उत्सपिणीके तीसरे समयमें उत्पन्न हआ। इस प्रकार इसने क्रमसे उत्सपिणी समाप्त की और इसी प्रकार अवसर्पिणी भी। यह जन्मका नैरन्तर्य कहा । तथा इसी प्रकार मरण का भी नैरन्तर्य लेना चाहिए। इस प्रकार यह सब मिलकर एक कालपरिवर्तन है। कहा भी है कालसंसारमें परिभ्रमण करता हआ यह जीव उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके सब समयोंमें अनेक बार जन्मा और मरा।' 8278. अब भवपरिवर्तनका कथन करते हैं-नरकगतिमें सबसे जघन्य आय दस हजार वर्षकी है। एक जीव उस आयुसे वहाँ उत्पन्न हुआ, पुनः घूम-फिरकर उसी आयुसे वहीं उत्पन्न हआ। इस प्रकार दस हजार वर्षके जितने समय हैं उतनी बार वहीं उत्पन्न हआ और मरा। पूनः आयूके एक-एक समय बढ़ाकर नरककी तेंतीस सागर आयु समाप्त की। तदनन्तर नरकसे निकलकर अन्तर्मुहूर्त आयुके साथ तिर्यंचगतिमें उत्पन्न हुआ। और पूर्वोक्त क्रमसे उसने तिर्यंचगतिकी तीन पल्योपम आयु समाप्त की। इसी प्रकार मनुष्यगतिमें अन्तर्मुहूर्तसे लेकर तीन पल्योपम आयु समाप्त की। तथा देवगतिमें नरकगतिके समान आयु समाप्त की। किन्तु देव1. बा. आ., आयु., गा. 26 । 2. --हणेण बहुसो मु., ना.। 3. एव तृती-आ., दि. 1, दि. 2 । 4. मरणमपि तथैव ग्रा-ता. । मरणस्यापि तथव ग्रा.----ना.। 5. बा. अण, गा. 271 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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