SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 239
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ --2110 § 276] द्वितीयोऽध्यायः [119 8275. संसरणं संसारः परिवर्तनमित्यर्थः । स एषामस्ति ते संसारिणः । तत्परिवर्तनं पञ्चविधम्----द्रव्यपरिवर्तनं क्षेत्रपरिवर्तनं कालपरिवर्तनं भवपरिवर्तनं भावपरिवर्तनं चेति । तत्र द्रव्यपरिवर्तनं द्विविधम्---नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं कर्मद्रव्यपरिवर्तनं चेति । तत्र नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं नाम त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां च योग्या ये पुद्गला एकेन जीवेन एकस्मिन्समये गृहीताः स्निग्धरूक्षवर्णगन्धादिभिस्तोत्रमन्दमध्यमभावेन च यथावस्थिता द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा अगृहीताननन्तवारानतीत्य मिश्रकांश्चानन्तवारानतीत्य मध्ये गृहीतांश्चानन्तवारानतीत्य त एव तेभव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्समुदितं नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते---- एकस्मिन्समये एकेन जीवेनाष्टविधकर्मभावेन ये गृहीताः पुद्गलाः साधिकामावलिकामतीत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णाः, पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त एव तेनैव प्रकारेण तस्थ जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । उक्तं च---- " सव्वे वि पुग्गला खलु कमसो भुत्तुज्झिया य जीवेण । ' तो पुलपरियट्टसंसारे" ।। " 8276. क्षेत्रपरिवर्तनमुच्यते--सूक्ष्म निगोदजीवोऽपर्याप्तकः सर्वजघन्यप्रदेशशरीरो लोकस्याष्टमध्यप्रदेशान्स्वशरीरमध्ये कृत्वोत्पन्नः क्षुद्रभवग्रहणं जीवित्वा मृतः । स एव पुनस्तेनैवावगाहेन द्विरुत्पन्नस्तया त्रिस्तथा चतुरित्येवं यावद् 'घनांगुलस्यासंख्येयभागप्रमिताकाशप्रदेशास्तावत्कृत्व8275. संसरण करनेको संसार कहते हैं, जिसका अर्थ परिवर्तन है । यह जिन जीवोंके पाया जाता है वे सारी हैं। परिवर्तन के पाँच भेद हैं-द्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन, कालपरिवर्तन, भवपरिवर्तन और भावपरिवर्तन । द्रव्यपरिवर्तनके दो भेद हैं-नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन और कर्म द्रव्यपरिवर्तन । अव नोकर्म द्रव्यपरिवर्तनका स्वरूप कहते हैं- किसी एक जीवने तीन शरीर और छह पर्याप्तियों के योग्य पुद्गलोंको एक समय में ग्रहण किया । अनन्तर वे पुद्गल स्निग्ध या रूक्ष स्पर्श तथा वर्ण और गन्ध आदिके द्वारा जिस तीव्र, मन्द और मध्यम भावरूप से ग्रहण किये थे उस रूपसे अवस्थित रहकर द्वितीयादि समयोंमें निर्जीर्ण हो गये । तत्पश्चात् अगृहीत परमाणुओंको अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा, मिश्र परमाणुओं को अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा और बीच में हीत परमाणओंको अनन्त वार ग्रहण करके छोड़ा। तत्पश्चात् जब उसी जीवके सर्वप्रथम ग्रहण किये गये वे ही नोकर्म परमाणु उसी प्रकारसे नोकर्म भावको प्राप्त होते हैं तब यह सब मिलकर एक नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन होता | अब कर्मद्रव्यपरिवर्तनका कथन करते हैंएक जीवने आठ प्रकारके कर्मरूपसे जिन पुद्गलोंको ग्रहण किया, वे समयाधिक एक आवलीFree बाद द्वितीयादिक समयोंमें झर गये । पश्चात् जो क्रम नोकर्म द्रव्यपरिवर्तनमें बतलाया है उसी क्रमसे वे ही पुद्गल उसी प्रकारसे उस जीवके जब कर्मभावको प्राप्त होते हैं तब यह सब एक कर्म द्रव्यपरिवर्तन कहलाता है । कहा भी है 'इस जीवने सभी पुद्गलोंको क्रमसे भोगकर छोड़ दिया। और इस प्रकार यह जीव असकृत अनन्तबार पुद्गल परिवर्तनरूप संसारमें घूमता है । ' 8276. अत्र क्षेत्रपरिवर्ततका कथन करते हैं-- जिसका शरीर आकाशके सबसे कम प्रदेशोंपर स्थित है ऐसा एक सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव लोकके आठ मध्य प्रदेशोंको अपने शरीरके मध्य में करके उत्पन्न हुआ और क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीकर मर गया। पश्चात् वही tray: उसी अवगाहनासे वहाँ दूसरी बार उत्पन्न हुआ, तीसरी बार उत्पन्न हुआ, चौथी बार 1. अच्छइ अणं-- दि. 1, दि. 2, आ., मु. 12. बा. अणु, गा. 25 । 3. शरीरमध्यप्रदेशान् कृत्वा मु. । 4, यावदङ्गुलस्या - दि. 1, दि. 2, आ. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy