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________________ 118] सर्वार्थसिद्धौ [219 § 273 साकारानाकारभेदात् । साकारं ज्ञानमनाकारं दर्शनमिति । तच्छद्मस्थेषु क्रमेण वर्तते । निरावरणेषु युगपत् पूर्वकालभाविनोऽपि दर्शनाज्ज्ञानस्य प्रागुपन्यासः ; अर्ध्याहतत्वात् ! सम्यग्ज्ञानप्रकरणात्पूर्वं पञ्चविधो ज्ञानोपयोगो व्याख्यातः । इह पुनरुपयोगग्रहणाद्विपर्ययोऽपि गृह्यते इत्यष्ट-:विध' इति उच्यते । 274. यथोक्तेनानेनाभिहितपरिणामेन सर्वात्मसाधारणेनोपयोगेन ये उपलक्षिता उपयोगिनस्ते द्विविधाः --- संसारिणो मुक्ताश्च || 10 और विभंगज्ञान । दर्शनोपयोग चार प्रकारका है-चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन | शंका- इन दोनों उपयोगोंमें किस कारण से भेद है ? समाधान साकार और अनाकारके भेदसे इन दोनों उपयोगोंमें भेद है । साकार ज्ञानोपयोग है और अनाकार दर्शनोपयोग है। ये दोनों छद्मस्थोंमें क्रमसे होते हैं और आवरणरहित जीवोंमें युगपत् होते हैं । यद्यपि दर्शन पहले होता है तो भी श्रेष्ठ होनेके कारण सूत्रमें ज्ञानको दर्शनसे पहले रखा है । सम्यग्ज्ञानका प्रकरण होने के कारण पहले पाँच प्रकारके ज्ञानोपयोगका व्याख्यान कर आये हैं । परन्तु यहाँ उपयोगका ग्रहण करनेसे विपर्ययका भी ग्रहण होता है, इसलिए वह आठ प्रकारका कहा है । विशेषार्थ - यहाँ जीवका लक्षण उपयोग बतलाकर उसके भेदोंकी परिगणना की है । उपयोगके मुख्य भेद दो हैं-ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ये दोनों प्रकारके उपयोग सब जीवों के पाये जाते हैं । इनके अवान्तर भेद कई हैं जो निमित्तविशेषसे होते हैं । ज्ञानावरण और दर्शनावरणके अवान्तर भेदोंका यथायोग्य क्षयोपशम और क्षय तथा दर्शनमोहनीयका उदयादि ये प्रधान निमित्त हैं । इनके कारण दोनों प्रकारके उपयोग बारह भेदोंमें विभक्त हो जाते हैं । इस प्रकार ज्ञानोपयोग के आठ और दर्शनोपयोग के चार भेद प्राप्त होते हैं । मुख्यतया संसारी जीवके एक काल में एक उपयोग और केवलीके दो उपयोग होते हैं। पर नाना जीवों की अपेक्षा परिगणना करनेपर वे बारह होते हैं । यद्यपि प्रथम अध्यायमें एक जीवके एक साथ चार ज्ञान बतला आये हैं और जिसके एक साथ चार ज्ञान होंगे उसके उसी समय तीन दर्शन भी पाये जायेंगे, पर यह कथन क्षयोपशमकी प्रधानतासे किया गया जानना चाहिए। एक जीवके एक कालमें मतिज्ञानावरण आदि चार ज्ञानावरण और चक्षुदर्शनावरण आदि तीन दर्शनावरण इन सात कर्मोंका क्षयोपशम हो सकता है पर तत्त्वतः उनके उस समय उपयोग एक ही होगा । क्षयोपशम ज्ञानोत्पत्ति और दर्शनोत्पत्ति में निमित्त है और उपयोग ज्ञान दर्शनकी प्रवृत्ति । जीवमें ज्ञान और दर्शन गुणकी धारा निरन्तर प्रवर्तित होती रहती है । वह जिस समय बाह्य और अन्तरंग जैसा निमित्त मिलता है उसके अनुसार काम करने लगती है । इतना अवश्य है कि संसार अवस्था में वह मलिन, मलिनतर और मलिनतम रहती है और कैवल्य लाभ होनेपर वह विशुद्ध हो जाती है फिर उसकी प्रवृत्तिके लिए अन्तरंग व बाह्य कारण अपेक्षित नहीं रहते ।" ही कारण है कि यहाँ जीवका लक्षण उपयोग कहा है । 8 274. सब आत्माओंमें साधारण उपयोगरूप जिस आत्मपरिणामका पहले व्याख्यान या है उससे उपलक्षित सव उपयोगवाले जीव दो प्रकारके हैं, इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं- -- जीव दो प्रकारके हैं- संसारी और मुक्त ||ion 1. विष उच्यते दि. 2, मु. 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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