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________________ 110] सर्वार्थसिद्धौ [213 § 258 कर्मस्थितिका काललब्धिः । उत्कृष्टस्थितिकेषु कर्मसु जघन्यस्थितिकेषु च प्रथमसम्यक्त्वलाभो न भवति । क्व तर्हि भवति ? अन्तःकोटीकोटीसागरोपमस्थितिकेषु कर्मसु बन्ध मापद्यमानेषु विशुद्धपरिणामवशात्सत्कर्मसु च ततः संख्येयसागरोपम सहस्रानायामन्तःकोटीकोटी सागरोपमस्थितौ स्थापितेषु प्रथमसम्यक्त्वयोग्यो भवति । अपरा काललब्धिर्भवापेक्षया । भव्यः पञ्चेन्द्रियः संज्ञी पर्याप्तकः सर्वविशुद्धः प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयति । 'आदि' शब्देन जातिस्मरणादिः परिगृह्यते । 8 259. कृत्स्नस्य मोहनीयस्योपशमादौ पशमिकं चारित्रम् । तत्र सम्यक्त्वस्यादौ वचनं; तत्पूर्वकत्वाच्चारित्रस्य । 8 260. यः क्षायिको भावो नवविध उद्दिष्टस्तस्य भेदस्वरूपप्रतिपादनार्थमाहज्ञानदर्शनदान लाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥4॥ 8261. 'च'शब्दः सम्यक्त्वचारित्रानुकर्षणार्थः । ज्ञानावरणस्यात्यन्तक्षयात्केवलज्ञानं के कालके शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्वके ग्रहण करने के योग्य होता है, इससे अधिक कालके शेष रहनेपर नहीं होता यह एक काललब्धि है । दूसरी काललब्धिका सम्बन्ध कर्म स्थितिसे है । उत्कृष्ट स्थितिवाले कर्मोंके शेष रहनेपर या जघन्य स्थितिवाले कर्मोंके शेष रहनेपर प्रथम सम्यक्त्वका लाभ नहीं होता। शंका- तो फिर किस अवस्थामें होता है ? समाधान- जब बँधनेवाले aat स्थिति अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपम पड़ती है और विशुद्ध परिणामोंके वशसे सत्ता में स्थित कर्मोकी स्थिति संख्यात हजार सागरोपम कम अन्तः कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्राप्त होती है तब यह जीव प्रथम सम्यक्त्वके योग्य होता है । एक काललब्धि भवकी अपेक्षा होती है- जो भव्य है, संज्ञी है, पर्याप्त है और सर्वविशुद्ध है वह प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है । 'आदि' शब्दसे जातिस्मरण आदिका ग्रहण करना चाहिए । 8259. समस्त मोहनीय कर्मके उपशमसे औपशमिक चारित्र होता है । इनमें से 'सम्यक्त्व' पदको आदिमें रखा है, क्योंकि चारित्र सम्यक्त्व पूर्वक होता है । विशेषार्थ - उपशम दो प्रकारका है—करणोपशम और अकरणोपशम । कर्मका अन्तरकरण होकर जो उपशम होता है वह करणोपशम कहलाता है। ऐसा उपशम दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय इन दो का ही होता है, इसलिए उपशम भावके दो ही भेद बतलाये हैं । किन्तु इतनी विशेषता है कि अनन्तानुबन्धी चतुष्कका अन्तरकरण उपशम नहीं होता, इसलिए जहाँ भी इसके उपशमका विधान किया गया है वहाँ इसका विशुद्धि विशेषसे पाया गया अनुदयोपशम ही लेना चाहिए । औपशमिक सम्यग्दृष्टिके दर्शनमोहनीयका तो अन्तरकरण उपशम होता है व अनन्तानुबन्धी चतुष्कका अनुदयरूप उपशम- यह उक्त कथनका भाव है । प्रकृतमें जिस जीवके औपशमिक सम्यक्त्वकी प्राप्ति होती है उसकी योग्यताका निर्देश करते हुए ऐसी चार यौग्यताएँ बतलायी हैं । विशेष इस प्रकार है-- पहली योग्यता अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण कालकी है । जिस जीवके संसारमें रहनेका इतना काल शेष रहा है उसे ही सर्वप्रथम सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो सकती है । पर इतने कालके शेष रहनेपर सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होनी ही चाहिए ऐसा कोई नियम नहीं है । इसके पहले सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं होती इतना सुनिश्चित है । I 8260. जो क्षायिकभाव नौ प्रकारका कहा है उसके भेदोंके स्वरूपका कथन करने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं क्षायिक भावके नौ भेद हैं-क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र ॥4॥ § 261. सूत्रमें 'च' शब्द सम्यक्त्व और चारित्रके ग्रहण करनेके लिए आया है । ज्ञाना Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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