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________________ -214 $ 261] द्वितीयोऽध्यायः [111 क्षायिक तथा केवलदर्शनम् । दानान्तरायस्यात्यन्तक्षयादनन्तप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदानम् । लाभान्तरायस्याशेषस्य निरासात् परित्यक्तकवलाहारक्रियाणां केवलिनां यतः शरीरबलाधानहेतवोऽन्यमनुजासाधारणाः परमशुभाः सूक्ष्माः अनन्ताः प्रतिसमयं पुद्गलाः संबन्धमुपयान्ति स. क्षायिको लाभः । कृत्स्नस्य भोगान्तरायस्य तिरोभावादाविर्भतोऽतिशयवाननन्तो भोगः क्षायिकः। यतः कुसुमवृष्टयादयो विशेषाः प्रादुर्भवन्ति । निरवशेषस्योपभोगान्तरायस्य प्रलयात्प्रादुर्भूतोऽनन्त उपभोगः क्षायिकः । यतः सिंहासनचामरच्छत्रयादयो विभूतयः। वीर्यान्तरायस्य कर्मणोऽत्यन्तक्षयादाविर्भूतमनन्तवीर्य क्षायिकम् । पूर्वोक्तानां सप्तानां प्रकृतीनामत्यन्तक्षयात्क्षायिकं सम्यक्त्वम् । चारित्रमपि तथा । यदि क्षायिकदानादिभावकृतमभयदानादि, सिद्धेष्वपि तत्प्रसङ्गः ? नैष दोषः; शरीरनामतीर्थकरनामकर्मोदयाद्यपेक्षत्वात् । तेषां तदभावे तदप्रसंगः । कथं तहि तेषां सिद्धेषु वृत्तिः ? परमानन्दाव्याबाधरूपेगव तेषां तत्र वृत्तिः । केवलज्ञानरूपेणानन्तवीर्यवृत्तिवत् । वरण कर्मके अत्यन्त क्षयसे क्षायिक केवलज्ञान होता है। इसी प्रकार केवलदर्शन भी होता है। दानान्तराय कर्मके अत्यन्त क्षयसे अनन्त प्राणियोंके समुदायका उपकार करनेवाला क्षायिक अभयदान होता है। समस्त लाभान्तराय कर्मके क्षय के कवलाहार क्रियासे रहित केवलियोंके क्षायिक लाभ होता है, जिससे उनके शरीरको बल प्रदान करने में कारणभूत, दूसरे मनुष्योंको असाधारण अर्थात् कभी न प्राप्त होनेवाले, परम शुभ और सूक्ष्म ऐसे अनन्त परमाणु प्रति समय सम्बन्धको प्राप्त होते हैं। समस्त भोगान्तराय कर्मके क्षयसे अतिशयवाले क्षायिक अनन्त भोगका प्रादुर्भाव होता है । जिससे कुसुमवृष्टि आदि अतिशय विशेष होते हैं । समस्त उपभोगान्तरायके नष्ट हो जानेसे अनन्त क्षायिक उपभोग होता है। जिससे सिंहासन, चामर और तीन छत्र आदि विभूतियाँ होती हैं । वीर्यान्तराय कर्मके अत्यन्त क्षयसे क्षायिक अनन्तवीर्य प्रकट होता है। पूर्वोक्त सात प्रकृतियोंके अत्यन्त विनाशसे क्षायिक सम्यक्त्व होता है। इसी प्रकार क्षायिक चारित्रका स्वरूप समझना चाहिए। शंका-यदि क्षायिक दान आदि भावोंके निमित्तसे अभयदान आदि कार्य होते हैं तो सिद्धोंमें भी उनका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान यह कोई दोष नहीं हैं, क्योंकि इन अभयदान आदिके होने में शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्मके उदयकी अपेक्षा रहती है। परन्तु सिद्धोंके शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं होते, अत: उनके अभयदान आदि प्राप्त नहीं होते । शंका-तो सिद्धोंके क्षायिक दान आदि भावोंका सदभाव कैसे माना जाय ? समाधान-जिस प्रकार सिद्धोंके केवलज्ञान रूपसे अनन्तवीर्यका सद्भाव माना गया है उसी प्रकार परमानन्द और अव्याबाध रूपसे ही उनका सिद्धोंके सद्भाव है। विशेषार्थ-घातिकर्मोंके चार भेद हैं—ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तय। इनमें से ज्ञानावरणक अभावस क्षायिक ज्ञान, दशनावरणक अभावसे क्षायिक दर्शन, मोहनीयके अभावसे क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र तथा अन्तरायके अभावसे क्षायिक दानादि पांच लब्धियाँ होती हैं। इसीसे क्षायिक भावके नौ भेद किये हैं। यद्यपि अघाति कर्मोके अभावसे जीवके क्षायिक अगुरुलघु आदि गुण प्रकट होते हैं पर वे अनुजीवी न होनेसे उनका यहाँ ग्रहण नहीं किया है । प्रश्न यह है कि टीकामें जो अभयदान आदिको शरीर नामकर्म और तीर्थकर नामकर्मकी अपेक्षा रखनेवाले क्षायिक दान आदिके कार्य बतलाये हैं सो ऐसा बतलाना कहाँ तक उचित है ? बात यह है कि ऐसा निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है कि तीर्थकरके गर्भ में आनेपर छह महीना पहलेसे भक्तिवश देव आकर, जिस नगरीमें तीर्थंकर जन्म लेते हैं वहाँ. रत्न 1. --यस्यात्यन्ताभा-मु । 2. --मानन्तवीर्याव्याबाधसुखरूपे-मु. ।--मानन्ताव्याबाधसुखरूप--आ., दि. 1, दि.21 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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