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________________ -1133 § 250] शक्त्यपेक्षया अस्तीत्युच्यते । नयेष्वपि निरपेक्षेषु बुद्ध्यभिधानरूपेषु कारणवशात्सम्यग्दर्शनहेतुत्वविपरिणतिसद्भावात् शक्त्यात्मनास्तित्वमिति साम्यमेवोपन्यासस्य' । इति तत्त्वार्थवृत्ती सर्वार्थ सिद्धि संज्ञायां प्रथमोऽध्यायः । प्रथमोऽध्यायः अवयवोंमें नहीं पाया जाता, इसलिए इससे हमारे पक्षका ही समर्थन होता है । यदि यह कहा जाय कि तन्तु आदिमें पटादि कार्य शक्तिकी अपेक्षा है ही तो यह बात बुद्धि और अभिधान - शब्दरूप निरपेक्ष नयोंके विषय में भी जानना चाहिए। उनमें भी ऐसी शक्ति पायी जाती है जिससे वे कारणवश सम्यग्दर्शनके हेतुरूपसे परिणमन करने में समर्थ हैं, इसलिए दृष्टान्त का दान्त से साम्य ही है । Jain Education International [105 विशेषार्थ प्रमाणके भेद-प्रभेदोंका कथन करनेके बाद यहाँ नयोंका निर्देश किया गया है । नय श्रुतज्ञानका एक भेद है यह पहले ही बतला आये हैं । यहाँ आलम्बनकी प्रधानतासे उसके सात भेद किये गये हैं । मुख्यतः आलम्बनको तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है, उपचार, अर्थ और शब्द । पहला नैगमनय उपचारनय होकर भी अर्थनय है । संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र अर्थनय हैं और शेष तीन शब्दनय हैं। आशय यह है कि नैगम नयकी प्रवृत्ति उपचारकी प्रधानतासे होती है, इसलिए इसे मुख्यता से उपचार नय कहा है । वैसे तो इसकी परिगणना अर्थनय में ही की गयी है । संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्रकी प्रवृत्ति अर्थकी प्रधानतासे होती है, इसलिए इन्हें अर्थनय कहा है और शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत नयकी प्रवृत्ति शब्दकी प्रधानतासे होती है, इसलिए इन्हें शब्द नय कहा है। जैसा कि हमने संकेत किया है कि नैगमनयका समावेश अर्थनयों में किया जाता है, किन्तु शेष अर्थनयोंसे नैगमनयको अर्थनय माननेमें मौलिक भेद है । बात यह है कि उपचारकी प्रधानता से वस्तुको स्वीकार करना यह नैगमनयका काम है, शेष अर्थनयोंका नहीं, इसलिए इसे उपचार नय कहा है। शेष अर्थनय तो भेदाभेद या सामान्य विशेषकी प्रधानता से सीधा ही वस्तुको विषय करते हैं वहाँ उपचारको विशेष स्थान नहीं, इसलिए हमने अर्थनयोंसे नैगमनयको पृथक् बतलाया है। माना कि नैगमनय भी गौण मुख्यभावसे भेदाभेद या सामान्यविशेषको विषय करता है पर इन सबकी जड़में उपचार काम करता है इसलिए नैगमनय मुख्यतः उपचारनय ही है । सिद्धसेन दिवाकरने नैगमनयको नय ही नहीं माना है इसका कारण यह उपचार ही है । उनके मतसे सम्यग्ज्ञानके प्रकरण में उपचारको कहाँ तक स्थान दिया जाय यह एक प्रश्न तो है ही । वस्तुस्पर्शी विकल्प और वस्तु में आरोपित विकल्प इनमें बड़ा अन्तर है । वस्तु स्पर्शी विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान देना तो अनिवार्य है, किन्तु यदि वस्तु में आरोपित विकल्पोंको सम्यग्ज्ञानकी कोटिमें स्थान दिया जाय तो अनवस्थाकी सीमा ही न रहे यह एक भय था, सम्भवत: इसी कारण आचार्य सिद्धसेन दिवाकरने नय प्रकरण में नैगमका नामोल्लेख नहीं किया है। किन्तु ऐसा उपचार, जो परम्परासे ही सही मूल कार्यका ज्ञान करानेमें सहायक हो और जिससे अवास्तविक भ्रम फैलनेका भय न हो या जो वस्तुका विपरीतरूपसे बोध न कराकर वस्तुके गूढ़तम तत्त्वकी ओर इशारा करता हो, ग्राह्य है ऐसा मानकर उपचार प्रधान नैगमनयको नयप्रकरणमें स्थान दिया गया है। इससे विचार करने की परिधि बढ़ जाती है और सम्यग्ज्ञानके जनक समग्र विचारोंका वर्गीकरण करनेमें सहायता मिलती है । यदि नैगमनयकी श्रेणीमें जो विचार आते हैं उन्हें मिथ्या मानकर सर्वथा छोड़ दिया जाता है - सम्यग्ज्ञानकी श्रेणीमें स्थान नहीं दिया जाता है तो अभेदकी ओर ले जानेवाले जितने विचार हैं उनकी भी यही गति होनी चाहिए। यदि उनसे वस्तुके स्वरूपका विश्लेषण करने में सहायता मिलती है, इसलिए उनकी नयकी श्रेणीमें परिगणना की जाती है तो यही बात नैगमनयके ऊपर भी लागू करनी चाहिए। इन नयोंका सामान्य और विशेष स्वरूप टीका में दिया ही For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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